सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-34
बन्दी की बातें सुन ही रहे थे कि पीछे की तरफ़ की बैरक से तेज़-तेज़ आवाज़ आने लगी, जीजी इधर भी आ,
मेरी माँ मुझे भी प्रसाद दे। पीछे मुड़कर देखा तो बाबू दादा, जो सभी की सहायता के लिए तैयार रहता था। फॉसी के बाड़े में अपनी बैरक से चिल्ला-चिल्ला कर आवाज़ दे रहा था। उसकी यह हालत देखकर मन घबराने लगा, जो बहन-भाई साथ थे वे मना करने लगे उसके पास जाने के लिये। समझ नहीं आ रहा था कि अचानक वो यहाँ कैसे आ गया। पूछने पर उसी बन्दी (जिससे हम बात कर रहे थे) ने बताया कि इसकी मानसिक हालत ख़राब होने से इसे सुरक्षा के लिए इस बाड़े में लाया गया है। उस भाई को शक था कि जो और बन्दी इससे ईर्ष्या रखते थे शायद उन्हीं लोगों ने इसको कुछ कर दिया है। दिल उस की यह दशा देखकर भी यह मानने को तैयार नहीं था कि अच्छा करने वालों के साथ इतना बुरा भी कोई कर सकता है। लेकिन उन लोगों का क्या किया जाये जो नेकदिल इंसानों को अपने रास्ते से हटाकर ख़ुद अपनी जगह बनाने में माहिर होते हैं। शायद दुनिया में ऐसे ही लोगों की उपस्थिति ज़्यादा
है, चाहे वह समाज का दायरा हो अथवा परमार्थ का। छल और छद्म से भरे चेहरे हर जगह सुशोभित हैं। ख़ैर----!
सिपाही भाइयों के मना करने के बावजूद मन नहीं माना और हम दोनों पति-पत्नी उसके पास बैरक पर आ गये।
सिपाही भाई बोला अखबार में प्रसाद रखकर फोल्ड करके इसे दे दो। अन्दर गेट की ग्रिल में हाथ मत डालना, इसकी मानसिक हालत ठीक नहीं है। इतना सुनते ही वह सिपाही भाई को गालियाँ बकने लगा।उसकी यह हालत पहले कभी नहीं देखी थी अत: मैं ख़ुद भी घबराकर उसका प्रसाद सिपाही भाई को देकर लौटने लगी, बाबू ने जैसे ही हमें लौटते देखा तो जोर-जोर से रोने लगा और कहने लगा कि जीजी तू भी इनकी बातों में आ गई, अरे मैं पागल नहीं हुआ हूँ इन्होंने मुझे जबरन यहाँ डाला है। मॉ अपने बेटे को बिना खिलाये कैसे जा सकती है।उसके रोने का तरीका बिलकुल छोटे बच्चों जैसा हो गया। दहाड़ें मारकर रोता देख हम वापस आ गये उसके पास, लेकिन उसकी ज़िद कि मेरी माँ अपने हाथ से खिलायेगी। सिपाही बार-बार मना किये जा रहा था कि ग्रिल में हाथ डालकर मत खिलाना। मुझे लगा कि एक तो वह इतना रोये जा रहा है और ये लोग हाथ से खिलाने को मना कर रहे हैं। उसका भाव तो मॉ का ही है ।जरूरी नहीं कि मॉ बूढ़ी ही हो । मॉ तो मॉ ही है । यह सोचकर मैंने ग्रिल में हाथ डालकर उसे पूरा प्रसाद खिला दिया। लेकिन जैसे ही हाथ बाहर निकालना चाहा बाबू ने हाथ कसकर पकड़ लिया और रोने लगा मम्मी मुझे बाहर ले चल, मेरी बैरक में लेके चल । बस यही ज़िद । सिपाही नाराज़ होने लगा कि मैंने मना किया था और आप नहीं माने
बहुत देर तक मैं उसी हालत में खड़े-खड़े गुरुदेव को प्रार्थना करती रही कि मुझे छुड़ाइये। इधर बाबू की ज़िद कि मुझे फॉसी के बाड़े से बाहर निकाल, इतने में प्रशासन तक यह ख़बर पहुँच गई और दो अन्य सिपाही उसकी बैरक का ताला खोलने का नाटक करते हुए बोले कि मैडम का हाथ छोड़ ? तभी तो ताला खोल पायेंगे। उसे लगा कि सचमुच उसे निकाल रहे हैं और उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। मैंने झट से हाथ बाहर निकाला और उस बाड़े से बाहर आ गई। प्रशासन ने मेरी अच्छी तरह क्लास ली और समझाया कि आइन्दा ऐसा न करें।
क्रमशः!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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