गुरुगीता-58

माता पार्वती ने नारद मुनि को गुरु बनाकर शिवजी को पति रूप में पाने के लिये मंत्र लिया और जप करने लगी।उनके घोर तप से तीनों लोक डगमगाने लगे।
ब्रह्मा, विष्णु और सारे ऋषि-मुनि देवता भगवान शिव के पास गये।उन्हें सारी बात कह सुनाई और बताया कि माता सती ने पार्वती के रूप में अवतार लिया है और आपको पाने के लिए घोर तप कर रहीं हैं।
भगवान शंकर ने सप्तॠषियों को परीक्षा लेने के लिए भेजा सप्तॠषियों ने जाकर उनके घोर तप की प्रशंसा की और कहा आप कहॉ शंकर भगवान को पाने के चक्कर में पड़ी हैं,वो तो अड़भंगी हैं।उनके पास न तो घर है, न ही वो अच्छे कपड़े पहनते हैं।श्मशान की राख लपेटे रहते हैं।आपके लिये ब्रह्मा या विष्णु सही रहेंगे।ऐसे भगवान शंकर की तमाम बुराइयाँ कह सुनाई।
माता पार्वती ने आदर से कहा, आप ऋषियों ने भला किया जो यहाँ आकर दर्शन दिया।पर आप लोग बाद में आये।मेरे गुरु नारद जी ने मुझे जो मंत्र दिया और बात बताई उसमें मुझे अडिग निष्ठा है।आप लोग पहले मिले होते तो बात अलग होती, पर अब ये जीवन तो मैं अपने गुरु नारद के दिये हुए ज्ञान के साथ ही बिताऊँगी और शिवजी को पाने के लिए तप करूँगी।
सप्तॠषियों ने शिवजी को जाकर सब बात कह सुनाई और शिवजी पार्वती माता की गुरुनिष्ठा और शिवजी के चरणों में
प्रेम जानकर अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये।
इस प्रकार शिव पार्वती विवाह सम्पन्न हुआ। जब भी नारद मुनि शिवजी से मिलने जाते हैं, वो शिव पार्वती को प्रणाम करते हैं तो माता पार्वती भी गुरु कहकर उनका सम्मान करतीं हैं, उन्हें ऊँचे स्थान पर आसन देकर उनका आदर सत्कार करतीं हैं।
पुराणों में इसीलिए कहा गया है कि "गुरु निष्ठा परम तपः
अर्थात् गुरु में एकनिष्ठ प्रीति होना परम तप करने के समान ही है"
गुरुगीता पाठ
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अशक्ता हि सुरा: सर्वेsअशक्ता मनुयस्तथा ।
गुरुशापहता:sक्षीणा: क्षयं यान्ति न संशय: ।।62।।
अर्थ:
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लेकिन गुरु शाप ग्रस्त क्षीण की रक्षा करने में सब देवगण, अशक्त होते हैं और मुनि मंडली भी अशक्त होती है और
वह व्यक्ति निश्चय क्षय को प्राप्त होता है ।।62।।
62.
If one is cursed by the Master, all the munis and deities can not protect him and he definitely perished.
                                      👣🙏

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