गुरुगीता-61
पिछली शताब्दी में स्वामी रामकृष्ण परमहंस उस स्तर की समर्थ मार्गदर्शक सत्ता हुई, जिसने शिष्यों को समय से पहले ही समाधि के लक्ष्य तक पहुँचाया। नरेंद्रनाथ दत्त स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास जाया करते थे। अध्यात्म, ईश्वर, भक्ति, ज्ञान और विद्या की बातें सुन-सुनकर एक दिन उन्होंने यही पूछा था कि क्या आपने ईश्वर को देखा है। गुरु ने ‘हाँ’ या ‘न’ में उत्तर दिया। प्रतिप्रश्न किया कि “तुम देखना चाहते हो?” इसके बाद गुरु और शिष्य में संवाद या व्यवहार का जो क्रम चला, उसकी परिणति नरेंद्र का क्षुद्र अहं ब्रह्म के विराट् सागर में डूब जाने के रूप में ही हुई। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने पाँव के अँगूठे से नरेंद्र का स्पर्श किया और शिष्य की समाधि खुली। जब समाधि खुली तो गुरु ने कहा, तुम्हें इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करनी थी, लेकिन चालीस वर्ष की आयु पूरी होने पर। माँ का आदेश था, सो समय से पहले झलक दिखा दी। अब पुनरावृत्ति नहीं होगी। समाधि बंद और चाभी मेरे पास। अब यह उपयुक्त समय आने पर ही सौंपी जाएगी।
कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद इस प्रतिबंध को यकायक झेल नहीं पाए। वे चीख उठे! गुरु से बहुत अनुनय-विनय की, लेकिन मार्गदर्शक सत्ता ने जरा भी रियायत नहीं की। कहा, माँ का आदेश है कि उसका यंत्र बनो। उसके यंत्र बनोगे तभी मुक्ति मिलेगी। स्वामी विवेकानंद ने अपने आपको गुरु के कार्य के लिए समर्पित किया। समाधि की प्रथम झलक मिलने के बाद उनके चित्त में व्यग्र भाव निरंतर बना रहा। वे अंत तक बेचैन रहे। जैसे किसी नाग से मणि छीन ली गई हो और वह उसे पाने के लिए छटपटाता घूम रहा हो। वैसा ही आवेग स्वामी विवेकानंद के कार्यों में भी था। उनके प्रवचनों में भी कहीं-कहीं यह आवेग दिखाई देता है। लगता है कि एक भाव ठीक से व्यक्त नहीं होता और दूसरा उसके पीछे दौड़ा चला आता है। यह आवेग गुरु की दिखाई झलक को वापस पाने के लिए ही था। अपना मिशन पूरा हो जाने के बाद स्वामी विवेकानंद के चित्त में थोड़ी शाँति आई। रहस्यदर्शियों का कहना है कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस अशरीरी रूप में उस समय शिष्य के पास आए थे और मृत्यु से कुछ पहले ही समाधि पर पड़ा परदा उठाया था।
गुरुगीता पाठ
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गुरुकृपाप्रसादेन आत्मा रामो हि लभ्यते ।
अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ।।65।।
अर्थ
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मनुष्य गुरु की कृपा से निश्चय सच्चिदानंद घन आत्मा को लाभ करता है।इस गुरु मार्ग द्वारा आत्मज्ञान अर्थात् "हम
सच्चिदानंदघन परमात्मा हैं" यह ज्ञान लाभ होता है ।।65।।
मनुष्य गुरु कृपा से प्राप्त मन्त्र उपासना से सिद्धि लाभ करके जीवन मुक्त होता है।
स्पन्दन और नाद परमात्मा की शक्ति है, शक्ति और शक्तिमान में कोई प्रभेद नहीं है।अनन्तर स्पन्दन शून्य होकर
-"मैं सच्चिदानंद घन परमात्मा हूँ"इस ज्ञान लाभ से कृतार्थ
होता है।।65।।
65.
Human beings by the grace of the Master realise the condensed consciousness existence and bliss form of Atma.
COMMENTS:
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I am the whole world, I am the Soul per excellence, and there is none else. The human beings by performing the worship of
the mantra by the grace of the Master attain
Perfection and become Zero, one attains
'Perfection and fulfilment with the knowledge
that I am condensed consciousness, existence and bliss soul per excellence.
👣🙏
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