सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-36

धीरे-धीरे समस्त बाड़ों में पूजा-पाठ का माहौल बनने लगा था। सभी की इच्छा होती थी कि हम लोग उनके पूजा के स्थान को देखें। एक दिन जब हम यज्ञ करा चुके तो एक भाई बोला दीदी जी मैंने अपने बिस्तर के पास ही पूजा का स्थान बनाया है जब भी फ्री होता हूँ तब वहीँ बैठकर जप और ध्यान करता हूँ आप सब मेरे बाड़े में चलकर देखिये तो ?हम लोग उसकी बातों से खुश होते हुए बोले-तुमने यह अच्छा काम किया, इतना सुनते ही सब अपना-अपना बताने लगे कि किस तरह उन्होंने भी देवस्थापना का चित्र अपने बिस्तर के पास लगा रखा है और बहस इतनी बढ़ गई कि आप हमारे साथ हमारे बाड़े में देखने चलो। सबको समझाया कि अगली बार जब आयेंगे तब चलेंगे लेकिन वे लोग नहीं माने और उनकी बैरकों में जाना ही पड़ा। जैसे ही हम वहॉ पहुँचे तो देखकर आश्चर्यचकित थे कि सचमुच उन लोगों ने कितनी अटूट श्रद्धा व निष्ठा के साथ गुरुदेव माताजी को अपने सिरहाने बिठा रखा है। पहले टीन के चित्र आते थे देवस्थापना के लिये। वही चित्र गुरुदीक्षा संस्कार में उन्हें दिये गये थे जो उन्होंने वहॉ पर बड़े ही विश्वास के साथ रखे हुयेे थे  और बाड़े बन्द हो जाने पर वहीं बैठकर, लेटकर, जिसकी जैसी
मन:स्थिति होती थी, उसी तरह जप व ध्यान करते थे। नवरात्रि साधना में जो भी प्रवचन गुरुदेव माताजी के उन्होंने सुने थे, उससे उन्हें पूर्ण विश्वास था कि गुरुदेव माताजी उनके सो जाने पर अवश्य ही आते हैं क्यों कि माताजी के संदेश में उन्होंने कहा था कि- बेटा तुम थक हारकर सो जाते हो तो हम दोनों (गुरुदेव-माताजी) तुम्हारे सिर पर हाथ फेरते हैं कि हमारा बच्चा कितना थक गया है और जब तुम हमारा काम करके थककर सोते हो तो बेटा हमैं तुम पर बहुत प्यार आता है, तुम्हारे पैरों को भी हम दबाते हैं।इस तरह वे माताजी द्वारा दिया गया प्रवचन हमें सुनाने लगे। इस तरह कुछ बैरकों में ही जा पाये लेकिन उनकी लगन देखकर मन बहुत खुश हुआ कि गुरुदेव माताजी सिरहाने बैठे हैं तो जरूर ही मस्तिष्क की धुलाई शुरू करेंगे।
इस तरह यज्ञ पूर्ण करके और बैरकों में देवस्थापना देखकर हम सभी अपने-अपने घरों के लिए रवाना हो गए।
                                         क्रमशः!!
                                     'गुरुकॄपा केवलम्'
                                "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                           👣🙏
                                         शशिसंजय

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