गुरुगीता-56
गौतम ऋषि के बहुत से शिष्य थे। परन्तु उनका भी सबसे अधिक प्रेम उत्तंक में ही था। उत्तंक के इन्द्रिय संयम, ब्रह्मचर्य, बाह्याभ्यांतर की पवित्रता, पुरुषार्थ, कर्म और उत्तमोत्तम सेवा से गौतमजी बहुत ही प्रसन्न रहते थे। इधर गुरुभक्त उत्तंक भी ऐसे सेवा में लीन हुए कि वे यह नहीं जान सके कि मेरा बुढ़ापा आ गया। एक दिन वे वन से लकडि़यों का भारी गट्ठर सिर पर धरकर ले आए और जब आश्रम में आकर उस बोझ को वे जमींन पर गिरान लगे तो उस समय चांदी के तार की भांति सफेद रंग की उनकी जटा उलझकर लकडि़यों के साथ ही जमीन पर गिर पड़ी। मुनि भार से तो दबे थे हीं, भूख-प्यास से भी अत्यंत पीडि़त हो रहे थे। उसी में जब उन्हें अपने केशों को देखकर यह भान हुआ कि मैं वृद्ध हो गया तो बहुत ही आर्त होकर रोने लगे। उस समय पिता की आज्ञा पाकर परम सुशील गौतम ऋषि की पुत्री ने अपने हाथों में उत्तंक के आंसुओं को ग्रहण कर लिया। परन्तु उन अश्रुबिन्दुओं से उनके हाथ जलने लगे, अतः अश्रु के कुछ बूंद टपककर पृथ्वी पर जा पड़े। परन्तु पृथ्वी भी उन्हें धारण करने में असमर्थ हो गई।
महर्षि प्रवर गौतम ने उत्तंकजी से रोने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि मेरे बाद आए हुए सैकड़ों, हजारों विद्यार्थी आपकी सेवा में आए और अध्ययन पूरा करके, आपकी आज्ञा पाकर अपने-अपने घरों को चले गए और मुझे यहां रहते हुए सौ वर्ष बीत गए तो भी आपने मुझे घर जाने की आज्ञा नहीं दी। गौतमजी ने कहा- विप्रवर! तुम्हारी गुरु सुश्रूषा से मैं ऐसा मुग्ध हो गया कि इतना अधिक समय बीत गया, तो भी मेरे ध्यान में यह बात आई ही नहीं। अब यदि आज तुम्हारे मन में यहां से जाने की इच्छा हुई है तो मेरी आज्ञा स्वीकार करो और शीघ्र ही यहां से अपने घर को चले जाओ। जब श्रीउत्तंकजी ने गुरु-दक्षिणा के लिए आज्ञा मांगी तो गुरु गौतमजी ने कहा कि तुमने जो सेवा की है, उसी से मैं बहुत संतुष्ट हूं, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। हे द्विज वर्य! यदि तुम आज सोलह वर्ष के तरुण हो जाओ तो मैं तुम्हें पत्नी रूप से अपनी कुमारी कन्या अर्पित कर दूंगा, क्योंकि तुम्हारे तेज को ग्रहण करने की क्षमता किसी दूसरी स्त्री में नहीं है। गुरूजी की प्रसन्नता के लिए उत्तंकजी ने तपोबल से तरुण होकर उस यशस्विनी कन्या का पाणिग्रहण किया।
तत्पश्चात् उत्तंकजी ने गुरुपत्नी अहल्या से कहा- माताजी! मुझे आज्ञा दीजिए, मैं गुरु दक्षिणा में आपको क्या दूं? मैं अपना प्राण देकर भी आपका प्रिय करना चाहता हूं। अहल्या ने कहा- पुत्र! मैं तुम्हारे भक्ति-भाव से ही परम प्रसन्न हूं। तुम्हारा कल्याण हो और तुम्हारी जहां इच्छा हो वहां जाओ। परन्तु उत्तंक ने जब बहुत आग्रह किया तो अहल्या ने कहा- बेटा! राजा सौदास की रानी ने जो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। उनके ला देने से तुम्हारी गुरु दक्षिणा पूरी हो जाएगी। तब ‘बहुत अच्छा’ कह कर उत्तंक राजा सौदास से कुण्डलों की याचना करने के लिए वहां से चल पड़े। उत्तंक के चले जाने पर जब महर्षि गौतम को सब वृत्तांत मालूम हुआ तो उन्हें बड़ा भारी पश्चाताप हुआ और वे पत्नी से बोले- देवि! तुमने ठीक नहीं किया। राजा सौदस तो श्रीवशिष्ठजी के शाप से राक्षस भावापन्न हो गए हैं, अतः वे उस ब्राह्मण कुमार को अवश्य ही मार डालेंगे। श्रीअहल्याजी ने उत्तंक की मंगल कामना की, मुनि ने तथास्तु कहा।
उत्तंकजी अत्यंत निर्भयता पूर्वक निर्जन वन में यमराज के समान भयंकर दीखने वाले राजा सौदास के सम्मुख उपस्थित हुए। उन्होंने राजा से कुण्डल की याचना की। राजा ने कहा- द्विज श्रेष्ठ! दिन के छठे भाग में मेरे लिए आहार का विधान किया गया है। यह वही समय है, मैं भूख से पीडि़त हूं। तुम भले आए। राजा सौदास के इस प्रकार के वचनों को सुनकर उत्तंक बोले- राजन्! आपको मालूम होना चाहिए कि मैं गुरु दक्षिणा के लिए आया हूं। मनीषी पुरुषों का कथन है कि शुभ कार्य के लिए उद्योगशील पुरुष अवध्य होते हैं। परन्तु जब उत्तंक ने देखा कि यह शापाभिभूत होने के कारण मुझे खाना ही चाहता है तब उन्होंने कहा- महाराज! मैंने गुरु को जो वस्तु देने की प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही अधीन है, अतः हे नरेश्वर! मैं आपसे उसकी भीख मांगता हूं। आप मेरी याचना को पूर्ण करें और विश्वास करें- मैं गुरु दक्षिणा चुकाकर फिर अपके पास आ जाऊँगा, तब मुझे खा लेना। श्रीउत्तंक की सुदृढ़ गुरुनिष्ठा और सत्य प्रतिज्ञा के प्रभाव से सौदास का हृदय परिवर्तित हो गया। उसने मुनि को खाने का विचार त्याग दिया और बोला विप्र शिरोमणे! आप रानी के पास जाइए और मेरी आज्ञ सुनाकर कहिए कि आप मुझे कुण्डल दे दें। महर्षि उत्तंक ने राजा सौदास की महारानी मदयन्ती के पास जाकर अपना प्रयोजन सुनाया। रानी ने कहा- मुनि श्रेष्ठ! मेरे ये दोनों मणिमय कुण्डल दिव्य हैं। देवता, यक्ष, महर्षि लोग भी विविध उपायों से इसे चुरा ले जाने की इच्छा से छिद्रान्वेषण करते रहते हैं। यदि इन कुण्डलों को पृथ्वी पर रख दिया जाय तो नाग इसे हड़प लेंगे। अपवित्र अवस्था में धारण करने पर इन्हें यक्षगण और निन्द्रावस्था में इन्हें पहनकर सो जाने से देवगण इसे बलात्कार पूर्वक छीन ले जाएंगे। ये दोनों कुण्डल रात दिन सोना टपकाते रहते हैं। रात्रि में ये नक्षत्र की आभा को भी छीन लेते हैं। इन्हें धारण कर लेने पर भूख-प्यास का भय नहीं रह जाता। धारक विष, अग्नि एवं हिंसक जन्तुओं से भी निर्भय हो जाता है। कुण्डलों के इतने गुणों से आकृष्ट होकर सभी लोग इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। ब्राह्मण! यद्यपि आप महाराज के पास से उन्हीं का संदेश लेकर आए हैं, तथापि आपको इस बात का कोई प्रमाण अवश्य लाना चाहिए।
मुनि उत्तंक पुनः राजा सौदास के पास आकर रानी का कथन सुनाया। राजा ने अपने संबंध में कुछ सांकेतिक वचन कहे, जिन्हें रानी समझती थीं और सौदास ने यह भी कह दिया कि अब आपको मेरे पास आने की आवश्यकता नहीं है। मुनि ने जाकर वे वचन रानी को सुनाए। महारानी मदयन्ती ने स्वामी का वचन सुनकर तत्काल अपने मणिमय कुण्डल मुनि को दे दिए। मुनि उन कुण्डलों को लेकर बड़े वेग से गौतम मुनि के आश्रम की ओर चले। रास्ते में उन्हें एक स्थान पर बड़े जोर की भूख लगी, वहां पास ही फलों के भार से झुका हुआ एक बेल का वृक्ष था। उत्तंक उस वृक्ष पर चढ़ गए और कुण्डलों को मृगचर्म में लपेटकर वृक्ष की एक शाखा पर धर दिए। संयोग से बेल उस मृगचर्म पर ही गिर पड़ा, जिससे वह पृथ्वी पर गिर पड़ा और साथ ही कुण्डल भी पृथ्वी पर गिर पड़ा। कुण्डल के पृथ्वी पर गिरते ही एक महासर्प आया और कुण्डल को लेकर तत्काल बिल में घुस गया। सर्प के द्वारा कुण्डलों का अपहरण होता देखकर मुनि उद्विग्न हो उठे और अत्यंत क्रोध में भरकर वृक्ष से कूद पड़े तथा एक काष्ट दण्ड हाथ में लेकर उस बांबी को खोदने लगे। मुनि पैंतीस दिनों तक बिना किसी घबराहट के बिल खोदने के कार्य में जुटे रहे। मुनि के दृढ़ निश्चय को देखकर पृथ्वी घबरा गयीं।
मुनि के दृढ़ संकल्प और पृथ्वी की घबराहट के साथ ही उनके अथक परिश्रम को देखकर देवराज इन्द्र को दया आ गई। वे एक ब्राह्मण का वेष बना कर मुनि के पास आए और दण्ड से बिल खादकर नागलोक तक पहुंचना असंभव बताया। तब उत्तंकजी ने कहा कि यदि ऐसी बात है तो मैं आपके सामने ही प्राणों का परित्याग कर दूंगा। तब इन्द्र ने दण्ड के अग्र भाग पर अपना वज्र संयोजित कर दिय, जिससे क्षण मात्र में ही नागलोक तक का मार्ग बन गया। उत्तंक मुनि नागलोक पहुंच तो गए परन्तु वहां की विशालता एवं व्यवस्था को देखकर निराश हो गए। उसी समय अग्निदेव वहां अश्व के रूप में प्रकट हो गए और मुनि से बोले- तुम मेरे पुच्छभाग में फूंक मारो, मैं अभी नागलोक को जला देता हूं। नागलोग कुण्डल देने के लिए विवश हो जाएंगे। मुनि ने ऐसा ही किया। फिर तो घबड़ाकर सभी नाग बूढ़े और बालकों को आगे करके हाथ जोड़, नतमस्तक हो गए। वे प्रणाम कर बोले- भगवन्! हम पर प्रसन्न होइए। फिर नागों ने उन्हें अध्र्य और पाद्य निवेदन किया और वे दोनों परम श्रेष्ठ दिव्य कुण्डल भी वापस कर दिए। तदनन्तर नागों से सम्मानित होकर महामुनि उत्तंक अग्निदेव की प्रदक्षिणा करके गुरु के आश्रम की ओर चल दिए। वहां पहुंचकर गुरुपत्नी को उनका अभीष्ट कुण्डल प्रदान किया तथा गौतमजी से समस्त वृत्तंत निवेदन किया। ऐसे उच्च कोटि के गुरू-भक्त थे मुनि उत्तंक।
महाभारत के युद्ध कें समाप्त हो जाने पर जब भगवान श्रीकृष्ण द्वारका जा रहे थे तो मार्ग में श्रीउत्तंकजी मिले। परस्पर अभिवादन के उपरान्त मुनि ने युद्ध का वृत्तंत पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- महर्षे! प्रारब्ध के विधान को काई नहीं टाल सकता। कौरव और पाण्डव दलों के सभी वीर युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गए। केवल पांच पाण्डव ही जीवित बच गए हैं। भगवान श्रीकृष्ण के इतना कहते ही उत्तंक मुनि क्रोध से जल उठे और बोले- श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय संबंधी थे, तथापि शक्ति रहते हुए भी तुमने उनकी रक्षा नहीं की। इसलि मैं तुम्हें शाप दूंगा। भगवान ने बड़ी शांतिपूर्वक कहा- भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिए मेरी अनुनय विनय स्वीकार कीजिए। मैं आपको अध्यात्म तत्त्व सुना रहा हूं। उसे सुनने के पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आप मुझे शाप दीजिएगा। मैं आपके संचित किए हुए तप का नाश नहीं कराना चाहता हूं। फिर भगवान ने मुनि को अध्यात्म ज्ञान की शिक्षा दी। ज्ञानयोग को श्रवण कर मुनि का चित्त अत्यंत प्रसन्न हो गया। रोष पूरी तरह से धूल हो गया। उनका हृदय निर्मल हो गया और वे श्रीकृष्ण के प्रति भक्तिभाव से पूर्ण हो गया। अतः शाप का विचार अपने आप जाता रहा। तत्पश्चात् श्रीउत्तंकजी ने भगवान श्रीकृष्ण से उस विश्वरूप का दर्शन कराने की प्रार्थना की जिसे युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन को दिखाया था। मुनि की इच्छा पर भवान श्रीकष्ण ने उन्हें अपना विराट् रूप दिखाया। मुनि उस रूप को देखकर कृत-कृत्य हो गए। पुनः मुनि की प्रार्थना पर भगवान श्रीकृष्ण ने उस रूप को समेटा और अपने पूर्व रूप में आ गए।
एक कणिक नाम का व्याध थ। वह स्वभाव से ही बड़ा क्रूर था। देवता, ब्राह्मण, गुरु, साधु, किसी को भी नहीं मानता था। सबकी निंदा करना, धन लूटना और प्राणियों की हत्या करना, यही उसका काम था। सौवीर नगर में भगवान विष्णु का एक बड़ा मंदिर था, जिसके शिखर पर विशाल स्वर्ण कलश लगा था। उस कलश को देखकर उस व्याध मन में यह अनुमान करके कि मंदिर में बहुत धन होगा, रात के समय मंदिर में चोरी करने के उद्देश्य से घुसा। मंदिर में महामुनि उत्तंक बैठकर नेत्र बन्द किए हुए भगवान के ध्यान में मग्न थे। उस दुष्ट व्याध ने मुनि को धक्का देकर पटक दिया और उसकी छाती पर पैर रखकर एक हाथ से उनके केश पकड़कर उनका सिर तलवार से काटने को उद्यत हुआ। ध्यान टूटने पर मुनि ने अपने नेत्र खोले और उसकी ओर प्रेम और करुणामय दृष्टि से देखा। उनके नेत्रों से ऐसा तेज और स्नेह उमड़ रहा था कि उस दुष्ट बुद्धि डाकू पर जादू सा हो गया। उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और वह दूर खड़ा होकर मुनि को एकटक आश्चर्य से देखने लगा। बड़े ही शीतल शब्दों में मुनि ने उससे कहा- ‘जो अपराध करता है, उसे दण्ड दिया जाता है। मैंने तो तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया तब मेरा वध क्यों करना चाहते हो? साधु तो सताने वालों को भी क्षमा करते हैं और उसका कल्याण ही करते हैं। पाप से धन एकत्र करके जो भी परिवार का पालन करते हैं, मरने पर समस्त पापों का फल उसे अकेले ही भोगना पड़ता है। अरे भाई! तुम क्या कर रहे हो, यह तुमने कभी सोचा है कि मरने पर इन पापों का कितना भयंकर फल होगा, इस पर कभी तुमने विचार किया है? यह जीवन तो भगवान की प्राप्ति के लिए तुमको मिला है, न कि पाप बटोरने के लिए। मोह को छोड़कर भजन में लगो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।’
महात्मा उत्तंक की वाणी का उस पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि वह पश्चाताप से व्याकुल हो गया और ऋषिवर के चरणों में गिरकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसी समय उसकी मृत्यु हो गई। दयालु मुनि ने उसके शरीर पर भगवान का चरणोदक छिड़का। उसी समय भगवान के पार्षद दिव्य विमान पर उसे बैठाकर परमधाम को ले गए। व्याध की यह सद्गति देखकर उत्तंक मुनि चकित हो गए। गद्गद् कण्ठ से उन दयामय भगवान की स्तुति करने लगे। भगवान ने कृपा कर मुनि को प्रत्यक्ष दर्शन दिया। मुनि बोले- ‘मुरारे! रक्षा करो, रक्षा करो।’ ऐसा कहते हुए मुनि ने भगवान के चरणों में गिरकर साष्टांग दंडवत प्रणाम किया। भगवान ने मुनि को अपनी विशाल भुजाओं में उठाकर हृदय से लगा लिया और वर मांगने को कहा। तब मुनि ने यह वर मांगा-
अर्थात- हे प्रभो! आप मुझे मोहित क्यों करते हैं? मुझे कोई वरदान नहीं चाहिए। जन्म-जन्मांतर में आपके चरणों में अविचल भक्ति सदा बनी रहे। मैं कीट-पतांगों, पशु-पक्षी, सर्प-अजगर, राक्षस-पिशाच या मनुष्य किसी भी योनि में रहूं, हे केशव! आपकी कृपा से मेरी सदा-सर्वदा आप में अव्यभिचारिणी भक्ति बनी रहे। भगवान मुनि को वरदान देकर तथा उनकी पूजा स्वीकार कर अन्तर्धान हो गए।
गुरुगीता पाठ
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गुरुरग्रेन वक्तव्यमसत्यं च कदाचन।
यो वै हुड्.कृत्य हुड्.कृत्य गुरुं निर्जित्य वादत:।
अरण्ये निर्जने स्थाने स भवेद् ब्रह्मराक्षस:।।60।।
अर्थ
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शिष्य के लिये गुरु के पास कभी मिथ्या वचन करना उचित नहीं है।यह निश्चित है, जो शिष्य हुम हुम करके वितर्क में गुरु को पराजित करता है, वह निर्जन महावन में ब्रह्मराक्षस होता है।।60।।
60.
One should never tell a lie in the presence of the Master. This is definite that the disciple
who speaks Hum Hum and vanquishes the Master in discussions, attains the incarnation of 'Brahma Rakshash' in a lonely
dense forest.
👣🙏
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