गुरुगीता-59

दीक्षा के बाद गुरु दक्षिणा देने के लिये मेरे पास कुछ भी नहीं था। मैंने हाथ जोड़कर गुरुदेव से पूछा, 'महाराज जी ! मैं यह नहीं समझ पा रहा हूँ कि मैं आपको क्या अर्पित करूँ संसार में वह कौन सी ऐसी वस्तु है जो आपको अच्छी लगती है  ? जिसको प्राप्त करके मैं आपके चरणों में अर्पित करने का प्रयास करूँ।'
गुरुदेव बोले ,'क्यों नहीं, तुम्हारे पास अर्पित करने के लिये बहुत चीजें हैं।कुछ सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी करके मुझे दे दो'।
  मैंने सोचा कि गुरुदेव भला सूखी लकड़ी लेकर क्या करेंगे।
फिर भी वे कह रहे हैं, अत: मुझे वैसा ही करना चाहिए।मैंने जँगल में जाकर सूखी लकड़ियों को इकट्ठा किया और उन्हें लाकर गुरुदेव को अर्पित किया। गुरुदेव बोले, 'तुम इन सूखी लकड़ियों को शुद्ध हृदय से मुझे दे दो '।
मैं गुरुदेव की ओर देखकर सोचने लगा कि गुरुदेव बुद्धिमान और ज्ञानी हैं फिर भला इनको क्या हो गया है।वह ऐसा क्यों कह रहे हैं।
मेरी तरफ देखकर गुरुदेव बोले, 'यही सबसे बड़ा उपहार है,दक्षिणा है जो कि तुम मुझे दे सकते हो। लोग मुझे सोना, चॉदी, जमीन, मकान आदि देना चाहते हैं।सॉसारिक दृष्टि से कीमती दिखने वाली ये चीज़ें मेरे लिए भला किस काम की हैं '। गुरुदेव ने मुझे समझाया कि जब तुम सूखी लकड़ी के टुकड़ों को गुरुदेव के चरणों में अर्पित करते हो तो गुरुदेव समझ जाते हैं कि अब तुम मोक्ष मार्ग के अधिकारी हो गये हो। लकड़ी अर्पित करने का मतलब है कि अब तुम अपने भूतकाल के कर्मों और आसक्तियों से मुक्त होने के लिये तैयार हो गये हो।सूखी लकड़ी अर्पित करते समय मन ही मन उस आदिगुरु परमात्मा से प्रार्थना करो कि-हे भगवन् आप कृपा करके मुझे अपने भूतकाल के कर्मों और आसक्तियों से मुक्त कर दीजिए।मेरे सभी संस्कारों को ज्ञान की अग्नि में,कृपा की अग्नि में जलाकर भस्म कर दीजिए।
फिर गुरुदेव बोले कि आज मैं लकड़ी के इन टुकड़ों को अग्नि में जलाकर भस्म कर दूँगा ताकि सभी कर्म नष्ट हो जायें। वे कर्म फिर तुम्हारे भविष्य को प्रभावित न कर सकेंगे। आज मैं तुम्हें एक नया जीवन दे रहा हूँ। तुम्हारा यह जीवन भूतकाल से प्रभावित नहीं होगा।अब तुम एक नये आध्यात्मिक जीवन का निर्माण करो । "स्वामी राम"
गुरुगीता पाठ
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मन्त्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् ।
श्रुतिवेदान्तवाक्येन गुरु:साक्षात् परं पदम् ।।63।।
अर्थ
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हे देवि!गुरु ये दो अक्षर मन्त्रराज हैं, श्रुति और वेदान्त से जाना जाता है कि गुरु ही सच्चिदानंदघन परमात्मा हैं।
63.
Oh Dev ! the word with two alphabets 'GU'-'RU' is the king of all the mantras and realized through vedas and vedanta. The Master is condensed form of consciousness, existence and bliss and is the soul per excellence.
                                👣🙏

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