गुरुगीता-63

गुरु से तिरस्कार और प्रताड़ना भी मिलती है। बहुत बार वे द्वार पर शिष्य भाव से आए साधक को स्वीकार नहीं करते। जैसे द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई। उसके माध्यम से अपनी अंतर्निहित संभावनाओं का आह्वान किया और गुरु के संकल्प का अतिक्रमण कर अर्जुन से भी बड़ी सिद्धि प्राप्त कर ली। उपनिषदों में आरुणि, श्वेतकेतु, सत्यकाम आदि शिष्यों का उल्लेख मिलता है। गुरु ने इन्हें कभी सामने बिठाकर विद्या नहीं सिखाई, न ही साधन-अभ्यास कराया था। व्यवहार में मार्गदर्शक सत्ता से उपेक्षा मिलने पर भी इन ऋषिकुमारों के मुखमंडल ब्रह्मतेज से चमकते रहते थे। कबीर प्रसंग तो इतिहास में भी शामिल है। स्वामी रामानंद ने उन्हें मंत्रदीक्षा देने से मना कर दिया। काशी के घाट पर वे योजना बनाकर गुरु के पाँवों तले आए। गुरु ने किसी व्यक्ति पर पैर पड़ते देखा, तो ‘राम’ ‘राम’ कह उठे। कबीर ने उसे ही गुरुमंत्र मान लिया। राम नाम जपकर निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति के स्तर तक पहुँच गए।
गुरु अपने भीतर ही विद्यमान है। परमपूज्य गुरुदेव कहा करते थे कि इस सद्गुरु की शरण में जाएँ और सर्वतोभावेन समर्पण करें। समर्पण हो जाए तो भीतर सोया पड़ा बीज टूट जाता है और उसमें निहित आत्मतत्त्व प्रकट होने लगता है। बाहर दिखाई देने वाली मार्गदर्शक सत्ता अपने भीतर विद्यमान सद्गुरु का ही प्रतिबिंब है, लेकिन कई बार ऐसी विभूतियाँ भी संसार में आती हैं, जो समय से पहले ही संभावनाएँ प्रकट कर देती हैं। उनमें सामर्थ्य होती है। संकल्प और स्पर्श मात्र से वे साधक को परम लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। ज्ञात इतिहास में इस तरह की दीक्षा देने वाले गुरुओं में आदि शंकराचार्य का नाम आता है। उन्होंने पद्मपाद, गोरक्ष, सुरेश्वर और हस्तामलक नामक शिष्यों का संकल्प मात्र से उद्धार कर दिया था। अपने पुरुषार्थ से प्रयत्न करते तो इन शिष्यों को आठ से बारह जन्म और लेने पड़ते। लेकिन आदि शंकर ने अपनी अलौकिक क्षमता से समय के पूर्व ही उन्हें परम स्थिति में पहुँचा दिया। यह बात अलग है कि इन विभूतियों को धर्म-संस्कृति के पुनरुत्थान का दायित्व भी सौंपा। कहा कि मुक्ति अनायास ही नहीं मिली है। अनुग्रह का मूल्य चुकाना पड़ेगा। वह गुरु के अधूरे कार्य को पूरा करने के रूप में होगा।
इस शताब्दी में परमपूज्य गुरुदेव के कितने ही शिष्यों को उनके सान्निध्य में विलक्षण अनुभूतियाँ हुई हैं। परिजनों के लौकिक दायित्व पूरे होने और स्वयं को गुरुदेव के काम में नियोजित कर देने वाले अनुभवों का एक अंबार है। वैसा अनुग्रह सौभाग्यशाली साधकों को ही मिलता है। गुरुदेव कहा करते थे कि पात्रता विकसित करने के रूप में वह सौभाग्य साधक को स्वयं ही प्राप्त करना पड़ता है। पात्रता नहीं हो तो मेज, कुरसी, कलम, आसन और दैनंदिन उपयोग की वस्तुओं के अलावा आस-पास रहने वाले दृश्य-अदृश्य जीव-जंतुओं की तरह कोई लाभ नहीं उठाया जा सकता।
गुरुगीता पाठ
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नित्य पूर्णं निराकारं निर्गुणंsस्वात्मसंस्थितम् ।
परात् परतरं ध्येयं नित्यमानन्दकारकम् ।।67।।
हृदयाकाशमध्यस्थं शुद्धस्फटिक सन्निभम् ।
अंगुष्ठमात्रं पुरुषं ध्यायते चिन्मयं हृदि ।।68।।
अत्रस्फुरतिsयोभाव: श्रुणु तं कथयाम्यहम् ।।69।।
अर्थ
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नित्य पूर्ण, आकाश शून्य, सत्व आदि गुण विहीन,अपने आत्मा में अवस्थित, नित्य परे से भी परे, आनन्द कारक,
हृदयाकाश मध्यस्थित, विशुद्ध स्फटिक मणि सदृशं अंगुष्ठमात्र पुरुष गुरुदेव को हृदय में ध्यान करना चाहिए उस
ध्यान काल में जो भाव प्रकाशित होता है वह मैं कहता हूँ, श्रवण करो ।।67-68-69।।
67-68-69.
One should meditate in one's heart the Master who is the Purusha of the size of a
thumb, eternal and complete, is devoid of forms and attributes and is beyond every thing poised in His soul itself and generates eternal bliss and is situated in the centre of the void of the heart resembling a pure unblemished crystal. Now listen to me about the state wich developes during the period of meditation.
                                                 👣🙏

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