गुरुगीता-62
एक संन्यासी हुए हैं स्वामी निगमानंद। गृहस्थ जीवन से निवृत्त होने के बाद उन्होंने संन्यास लिया। आमतौर पर लोग घर-गृहस्थी छोड़कर संन्यास लेते हैं या पारिवारिक दायित्व सिर पर आने से पहले ही हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी, प्रयाग, पैठण, काँची, रामेश्वरम् आदि तीर्थों में भाग जाते हैं। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की मृत्यु के बाद संन्यास लिया। पत्नी के रहते उनके मन में अध्यात्म की लवलेश झलक भी नहीं दिखाई देती। पत्नी भी औसत स्तर की गृहिणी थी। सामान्य स्त्रियों में पूजा-पाठ और व्रत-उपवास के प्रति जितनी रुचि हो सकती थी, उसमें थी। दोनों बहुत प्रेम और लगाव से रहते थे। पति कुछ ज्यादा ही आतुर अनुरागी थे। विवाह के बारह वर्ष बाद तक संतान नहीं हुई। परिवार में दोनों ही थे। तीस वर्ष की उम्र में पत्नी को किसी रोग ने आ घेरा और वह चल बसी।
पत्नी के निधन ने पति को बरी तरह आहत कर दिया। लगा कि संसार में कुछ रहा ही नहीं है। जीने का कोई उद्देश्य और अर्थ नहीं बचा। एक बार मन में आया कि पत्नी की चिता के साथ खुद भी जल मरें, लेकिन पत्नी का शव जलाने की भी हिम्मत नहीं हुई। आसक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि उसे सामने रखकर धूनी रमाए से बैठे रहे। स्वजन-संबंधियों ने समझा-बुझाकर और कुछ जोर-जबर्दस्ती दिखाकर अंत्येष्टि की। पति ने पत्नी का शरीर जलते देखा और अंतस् में जैसे क्राँति घटित हो गई। उठती हुई लपटों के साथ पत्नी की विभिन्न मुद्राएँ स्मृतिपटल पर आ गईं। उठना-बैठना, बात करना, प्रेम जताना, हँसना, गाना और कामकाज करना सभी याद आने लगा। इन घटनाओं के उभरने के साथ ही यह बोध जागा कि पत्नी मरी नहीं है। शरीर जला है, लेकिन यह शरीर पत्नी का नहीं था। अस्तित्व का कोई और तल था, जो पत्नी की तरह व्यवहार करता था।
वह कौन-सा-स्वरूप था? सोचने-समझने में देर लग सकती है, लेकिन स्मृति में चमक की तरह कौंध जाने में क्षणभर भी नहीं लगा। उस स्मृति के साथ ही बोध जागा और संकल्प उठा कि पत्नी के शाश्वत रूप की खोज करनी चाहिए। इस संकल्प ने उन्हें संन्यास की प्रेरणा दी। पत्नी का ध्यान किया, स्मरण किया, मंत्र जपा, चिंतन-मनन में उतरे। कोई भक्त अपने इष्ट-आराध्य को जिस आतुरता से पुकारता है, इसे ही व्यग्र भाव से उन्होंने ‘पत्नी’ की साधना की। माता-पिता-गुरु और संत की आराधना-उपासना कर हजारों साधक मुक्ति के लक्ष्य तक पहुँचे होंगे। स्वामी निगमानंद ने पत्नी की आराधना की और सिद्ध स्तर पर पहुँचे। पश्चिम बंगाल के नदिया क्षेत्र में हुए इस संन्यासी को लोगों ने नहीं स्वीकारा, लेकिन स्वामी निगमानंद ने इसकी कभी चिंता नहीं की। वे कहते थे पत्नी के प्रेम ने उन्हें लौकिक दुःखों और अपेक्षाओं से मुक्त कर दिया। परमेश्वर का कोई और रूप दूसरों के लिए आराध्य होगा, मेरे लिए तो पत्नी ही ईश्वर रूप है। वही परमात्मा है। बाद में उन्होंने आश्रम भी बनाया और साधकों को योगभक्ति की शिक्षा दी।
किसी ने आशंका जताई कि पत्नी भी परमात्मा हो सकती है भला? पुत्र में परमात्मा के दर्शन किए जा सकते हैं। जैसे कौशल्या और यशोदा द्वारा, तो पत्नी के रूप में ईश्वर को क्यों नहीं देखा जा सकता? पति के माध्यम से परमात्मा को प्रकट किया जा सकता है, जैसे कि अनुसूया, सावित्री, राधा आदि ने स्वामी भाव से पति की आराधना की और जगन्नियता की झलक देखी, तो स्वामी निगमानंद ने ही कौन-सा अनर्थ किया।
किसी भी माध्यम से परमात्मसत्ता तक पहुँचने के मार्ग को मनीषियों ने गुरु-शिष्य संबंध के रूप में देखा है। गुरु एक माध्यम होता है। उसके व्यक्तित्व में विराट् ब्रह्म की झाँकी देखी जाती है, तभी दिव्यभाव प्रकट होता है। ज्यादातर मामलों में गुरु एक निमित्त कारण होता है। संभावनाएँ वस्तुतः अपने भीतर से ही प्रकट होती हैं। स्वामी निगमानंद के अनूठे प्रसंग में पत्नी एक साधारण स्त्री थी, लेकिन साधक संन्यासी के लिए वह एक निमित्त ही सिद्ध हुई। संभावनाएँ स्वयं स्वामी निगमानंद में थीं। एक अवलंबन पाकर वे प्रकट हो गईं।
गुरुगीता पाठ
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आब्रह्म स्तम्बपर्यन्तं परमात्मस्वरूपकम् ।
स्थावरं जंगमं चैव प्रणमामि जगन्मयम् ।।66।।
अर्थ
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ब्रह्म से तृण गुच्छ पर्यन्त और पर्वत आदिस्थिति शील और मानव आदि गतिशील जगन्मय परमात्मा स्वरूप गुरु को प्रणामकरता हूँ ।।66।।
66.
I offer my obesiance to the Master the soul per excellence of the form of this world, from Braham to straw and from stable mountains to the moving human beings.
👣🙏
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