सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-35
बाबू दादा के हाथ कसकर पकड़ लिये जाने की बात हवा की तरह पूरे परिसर में फैल चुकी थी, जो भी बन्दी सामने आते वही सब समझाने लगते कि दीदी उसे आपके ऊपर भरोसा था इसीलिए उसने ऐसा किया। दादा दिल का बुरा नहीं है आदि-आदि। लेकिन उस समय मेरी मानसिक स्थिति इतनी गड़बड़ थी कि न तो उन्हें कुछ जबाब देते बन रहा था और ना ही बोलने का मन था।बस बाबू की आवाज़ कानों में गूँज रही थी कि मेरी माँ मुझे निकाल यहाँ से, मेरी दीदी मुझे ले चल बाहर। उसकी ऑसुओं धार याद आ रही थी,शायद जितना बेटा परेशान था उतनी ही मैं भी दुखी थी, लेकिन अनुशासन और प्रशासन के समक्ष मजबूर थी तभी तो प्रशासन ने जो कुछ भी बोला सब बातों पर हॉ-हॉ किये जा रही थी। शायद इस स्थिति को अधीक्षक महोदय समझ चुके थे अत: उन्होंने प्यार से समझाना शुरू किया बोले-मैडम मैं आपकी भावनाओं को पहले दिन से समझता हूँ ये लोग भी आपको बहुत सम्मान और प्यार करते हैं तभी तो बाबू को लगा कि आप उसे निकाल सकती हैं। वे लोग समझते हैं कि गायत्री परिवार निस्वार्थ प्रेम करता है वर्ना यहाँ तो और भी संस्थायें आती हैं, उनके कार्यक्रमों में जबरन बैरकों से निकालना पड़ता है एक आप लोग और दूसरे योग के गुरुजी।आप लोगों के कभी देर से आने पर इनकी निगाहें बाहर की ओर ही झॉक रही होती हैं। हम भी नियमों से बँधे हैं अन्यथा हर बन्दी यहाँ आजाद घूमेगा, फिर प्रशासन का कोई महत्व नहीं रह जाता। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि बाबू निर्दोष है अभी जॉच चल रही है कि उसके साथ किसने क्या किया। आप निश्चिंत रहें और बराबर आते रहें।
उनके इस तरह समझाने से कुछ मन:स्थिति ठीक हुई और हम लोग बाकी की बैरकों में प्रसाद बॉटने निकल पड़े। लगभग 13-14 बाड़े थे उन सभी में कम से कम 4-5 बैरकें होती थीं। एक बाड़े में लगभग 250 बन्दी होते थे। सभी बाड़ों में प्रसाद देते-देते शाम हो चुकी थी, बाड़े बन्द होने का समय भी हो चुका था। सबको प्रसाद देने के बाद प्रशासनिक स्टॉफ को भी प्रसादी देकर अधीक्षक महोदय से पुनः क्षमा चाहते हुये हम अपने-अपने घरों को वापस लौट आये, मन में यह ख़याल रखते हुए कि फॉसी के बाड़े में अब तो अगले नवरात्रि में ही जाना होगा, तब तक गुरुदेव- माताजी बाबू का ख़याल रखें ।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
शशिसंजय
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें