सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-37

हमारे कारागार में यज्ञ कराने जाने के बाद जब पहले नवरात्रि साधना के दिन आये तो हम लोग पूरे नौ दिन तक अखण्ड दीप जलाते थे, जब साधना शुरू की तो बन्दी भाइयों ने सबसे पहले पूरा कारागार हमें दिखाया, जिसमें वहां का भोजनालय जहाँ आटा गूँथने की बड़ी सारी मशीन उन्होंने ख़ुद ही बनाई थी, जिसमें लगभग 50 किलो आटा एक साथ गुँथ जाता था। उसमें शायद उन्होंने मोटर फ़िट कर रखी थी, जिससे फटाफट आटा तैयार हो जाता था। बहुत ही शानदार काम किया था उन्होंने।जब हम भोजनालय देख चुके तो अधीक्षक महोदय ने कहा-"अरे आप यहाँ अखण्ड दीपक क्यों नहीं प्रज्वलित कर देते  ? पूरी जेल का अन्नपूर्णा घर यहीं से चलता है, माताजी यहाँ विराजमान होनी चाहिए" इस प्रकार गत 24 सालों से भोजनालय में हमेशा एक दीपक जलता रहता है। कहते हैं कि "आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है" वे लोग कुछ न कुछ नया काम करते ही रहते थे। एक बार हम लोग जब पहुँचे तो देखा कि दो तीन भाई अलग-अलग चबूतरे पर बैठकर पत्थर के टुकड़े से चने पीस रहे हैं, जब हमने पूछा कि क्या करोगे इसका-तो कहने लगे-हमें भीगे हुये चने नाश्ते में दिये जाते हैं हम इन्हें सुखाकर और इस तरह पीसकर बेसन बना लेते हैं।इससे बहुत कुछ बनता है। सर्दियाँ आने पर उसी बेसन से वे लड्डू भी बना लेते थे,कैसे बनाते थे ये बता पाना बड़ा मुश्किल काम है। सभी एक से बढ़कर एक हुनरमन्द थे। एक बार गुरुदीक्षा के समय मालायें वितरित करने के लिये कम पड़ गईं क्यों कि जो संख्या दीक्षा लेने वालों की उन्होंने बताई थी उससे बहुत लोग ज्यादा हो गये थे। हमारी हालत बड़ी अजीब सी हो गई क्यों कि वहां तुरंत किसी भी चीज़ की व्यवस्था करना बड़ा मुश्किल था। थोड़ी ही देर में धागे से बनी जपमालाओं का स्टॉक आ गया जब पूछा कि ये कहॉ से आईं, तो तुरंत जबाब मिला कि आप परेशान होते हो, इसलिए हमें दरियॉ बनाते समय याद आया कि क्यों न इस धागे से जप करने के लिये माला बना ली जायें और देखो न भाई साहब आज काम आ ही गयीं,यह कहकर उन्होंने दीक्षा लेने वाले सभी भाइयों को ख़ुद ही तैयार की गई मालायें थमा दीं। चूँकि मुझसे प्यार कम और डॉट ज्यादा पड़ती थी इसलिए उन्होंने भाई साहब का सहारा लेना ज्य़ादा उचित लगा। मेरे जेहन में हमेशा एक ही बात रहती थी कि प्रशासन को ध्यान में रखकर ही कोई काम किया जाये, बाद में कहीं कुछ सुनने को न मिले। जब भी कभी कुछ छोटी सी ग़लती भी बन्दी भाइयों से हो जाती तो हमारे कारागार में घुसते ही एक उलाहना भरा लहजा सिपाहियों का होता-"अजी मैडम जी, ये गायत्री वाले बन्दियों को ज़रा समझा देना"। अब वे लोग जो जप-यज्ञ करते थे,सभी प्रशासन की नज़र में गायत्री वाले हो गये थे।
                                             क्रमशः!!
                                       'गुरुकॄपा केवलम्'
                                  "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                             👣🙏
                                           शशिसंजय

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