सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-39

लगभग 5-6 साल बाद अचानक से मालूम हुआ कि जो अधीक्षक महोदय हमें बहुत सहयोग करते थे, तथा बहुत ही भावनाशील भी थे,उनका स्थानांतरण कहीं और हो गया है। दूसरे अधीक्षक आ चुके हैं। जब हम उनसे मिलने गये, तो परिचय पाते ही थोड़ी परेशानी के साथ बोले इन यज्ञ- हवन से क्या होता है, कितने साल हो गये आपको आते हुए, बताने पर बोले कि कुछ बदलाव दिखा क्या इन बन्दियों में ?
जब बताया कि हॉ इनमें काफ़ी बदलाव आया है, तो झट से बोले बताइये कि क्या बदलाव आया है, जब हम लोगों की बातों से सन्तुष्ट हो गये तो बोले कि ठीक है,आते रहिये, कराते रहिए। उनके इतना कहने के बाद भी न जाने क्यों उत्साह नहीं था हम लोगों में, ऐसा लग रहा था कि उन्होंने बिना मन के कह दिया है। असलियत में जेल में भी सामाजिक संस्थाओं को बुलाया जाता है तथा उनका व्यौरा भी रखा जाता है। कारागार के मुख्य द्वार पर जो बोर्ड लगा था उस पर आने वाली संस्थाओं में दूसरे नंबर पर गायत्री  परिवार का नाम व वर्ष लिखा था। ख़ैर---।
हम लोग बराबर जाते रहे और यथावत् ड्रामा हॉल में यज्ञ
कराते रहे। एक दिन जब हम यज्ञ कराने पहुँचे तो आदेश
(मौखिक) मिला कि नौ नंबर बाड़े में यज्ञ करना है आगे से ड्रामा हॉल में यज्ञ नहीं करना है। हमें नौ नंबर बाड़े में ले जाया गया जो ड्रामा हॉल से लगभग आधा किलोमीटर अंदर की ओर था, प्रशासन के अनुसार उस बाड़े में दादा प्रवृत्ति के बन्दी थे, जब हम बाड़े में घुसे तो देखा एक बहुत ही छोटा सा शिव परिवार का मन्दिर पीपल के बहुत पुराने पेड़ के नीचे पक्के फ़र्श पर बना रखा है। हमने जानना चाहा कि मन्दिर कब से है तो बन्दियों का जबाब था कि कुछ पता नहीं ,सुना है कि बहुत पुराने समय से ये छोटा सा शिव परिवार विराजित है, यहाँ पर किसी को भी इनकी स्थापना के बारे नहीं पता था।
हमने भी गुरु आदेश मानकर उस दिन वहीं पर यज्ञ किया और उस बाड़े की पॉचों बैरकों में जाकर सभी बन्दियों से मुलाक़ात की और हमारे साथ यज्ञ में शामिल होने के लिए कहा। जो भाई यज्ञ में शामिल हुए थे उन्हीं में से 4 लोगों को उस चबूतरे की हर रोज़ सफाई की व्यवस्था तथा यज्ञ के सामान को वापस ड्रामा हॉल में रखने तथा अगली बार के यज्ञ में सामान ड्रामा हॉल से वापस लाने की जिम्मेदारी दे दी गईं,और इस तरह उस दिन का कार्यक्रम तो सम्पन्न हो गया लेकिन मन ठीक नहीं था। कहॉ तो इतना बड़ा ड्रामा हॉल जहाँ एक साथ 2000 बन्दी भी बैठ जाते तो भी जगह बची रहती और दूसरी ओर मन्दिर का वह प्रॉगण। फ़िर मुख्य सड़क से चार गेट पार करके नौ नंबर बाड़े तक लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर पहुँचना। लग रहा था कि जैसे बहुत बड़ी परीक्षा देनी पड़ रही हो।
          जो भी हो, यह सोचकर कि जैसा गुरुदेव चाह रहे
होंगे वैसा ही हो रहा होगा। क्या पता गुरुदेव की क्या योजना छिपी है इसके पीछे, हमने अपने मन को समझाने की कोशिश की,और उस दिन का कार्यक्रम सम्पन्न करके
अपने-अपने घरों को लौट आये।
                                         क्रमशः!!
                                  'गुरुकॄपा केवलम्'
                             "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                        👣🙏
                                      शशिसंजय

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