सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-41

लगातार कारागार में जाते-जाते कब 6 साल बीत गए पता ही नहीं चला। इस बीच गिलहरी द्वारा दीपक गिरा देना, बन्दरों द्वारा प्रसाद खा लेना, फलों को लेकर पेड़ पर चढ़ जाना, और भी न जाने कितनी जद्दोजहद करते कराते सन् 2000 के आश्विन नवरात्रि भी आ गये।
लगातार नवरात्रि  साधना पूरी करके नवमी के दिन पूर्णाहुति यज्ञ में नये आये जेल अधीक्षक को भी बुलाया था। वे अभी कुछ दिनों पहले ही आये थे, यज्ञ सम्पन्न होने पर उन्होंने अपने उद्बोधन में काफ़ी तारीफ़ की और कहने लगे कि मेरे लायक कोई भी काम हो तो बताइयेगा, मेरा सहयोग आपको हमेशा मिलता रहेगा। उनके इतना कहते ही हमने कहा कि ये भाई (बन्दी भाई) आपसे कुछ कहना चाहता है, उन्होंने तुरंत बोलने की इजाजत दे दी, तब उस भाई ने खुले में यज्ञ से आ रही परेशानियों के बारे में बताया कि किस तरह गिलहरी, बन्दर अपना-अपना काम करके परेशानी पैदा कर रहे हैं।यदि आप बहुत छोटी सी गायत्री माता की मूर्ति और छोटा सा उनका मंदिर बनाने की इजाज़त दे दें तो हम सबके लिये अच्छा रहेगा। उन्होंने झट से इज़ाजत दे दी जैसे शायद उनके दिमाग में पहले से ही गुरुदेव ने यह बात बैठा रखी हो कि ना नहीं करना है। हम सभी बहुत खुश हो गये। अगले रविवार को भूमि पूजन के लिये बोल दिया था उन्होंने। हम लोग इतने भावुक हो गये थे कि समझ नहीं आ रहा था कि किन शब्दों में गुरुसत्ता का धन्यवाद करें।
अगले ही दिन हम मन्दिर बनाने की अनुमति दिये जाने का प्रार्थनापत्र लेकर अधीक्षक महोदय के पास पहुँचे, उन्हें पत्र दिया पढ़कर उन्होंने उस पत्र को यह कहकर फाड़ दिया कि बहन जी मैं जुबान का पक्का आदमी हूँ, आपसे कह दिया तो कह दिया।अब मेरी बात में किसी भी प्रकार की उलट-फेर नहीं होगी। अरे आप काम तो शुरू करो। हम लोग वापस लौट आये इस चिन्ता के साथ कि ये सब होगा कैसे। जब अगले रविवार को हम पहुँचे तो यज्ञ में अधीक्षक महोदय पहले से ही मौज़ूद थे, पूर्णाहुति के बाद उन्होंने बन्दियों से कहा-अरे छोरा गड्ढा खोदो और पूजा करो। इस तरह भूमि पूजन सम्पन्न हुआ, हमारे साथ जो गायत्री परिवार का भाई था उसने आरती के थाल में 500/₹ का नोट चढ़ाया,बस वही नोट से हमने शुरुआत की मन्दिर के लिए सामान लाने की। मिस्त्री, बेलदार, इन्जीनियर आदि तो वहां पर बन्दी भाई थे ही, हमें तो केवल सामान की व्यवस्था करनी थी। यज्ञ व भूमि पूजन सम्पन्न करके हम कारागार के पास ही जो सीमेंट, बजरी, ईंटों की दुकान थी उस पर वही पॉच सौ रुपये एडवांस देकर सामान पहुँचाने का कहकर आ गये और इस तरह कारागार के नौ नंबर बाड़े में गायत्री  मन्दिर बनने का काम शुरू हो गया। हमें ना तो आगे क्या होगा यह मालूम था और ना ही दिमाग कुछ सोच पा रहा था  बस यन्त्रवत से हम देखे जा रहे थे कि यह सब हो क्या रहा है, गुरुदेव माताजी आगे क्या कराने वाले हैं। सामान के पहुँचने पर तुरंत ही सारे गेट यह कहकर खोल दिये जाते कि ये गायत्री मन्दिर का सामान है। किसी भी तरह का विघ्न नहीं था, सभी अपना-अपनासहयोग दे रहे थे।
                                           क्रमशः!!
                                     'गुरुकॄपा केवलम्'
                                "गुरुवर शरणम् गच्छामि"
                                           👣🙏
                                          शशिसंजय

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426