अमृतवाणी-170-171-172

आत्मावलोकन का सरल उपाय—एकान्तवास (भाग 4)
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माघ के महीने में लोग झोंपड़े लगा लेते हैं, उसी में रहते हैं, बाहर-निकलते ही नहीं, बाहर जाते ही नहीं, घर वालों को बुलाते ही नहीं। घरवाला अगर कोई आता है, तो सिर्फ खुशी के समाचार ही सुनाता है। कोई जरूरत की बात कहने आता है; पर यह नहीं कहने आता कि घर में यह आफत आ रही है कि वह आफत आ रही है। उनके चित्त में चंचलता उत्पन्न न हो, इसलिए वह लोग चिट्ठी-पत्री पर भी रोकथाम रखते हैं। हमारे पास चिट्ठी-पत्री मत भेजना, हमको एक महीने भगवान का नाम लेने देना, चिट्ठी-पत्री भेजकर, हम जो काम नहीं कर सकते हैं, उस काम के लिए हम पर दबाव मत डालना, न हम इधर के रहेंगे, न हम उधर के रहेंगे—न हम भगवान में ध्यान लगा सकेंगे, न घर की कोई सहायता कर सकेंगे। आप डावाँडोल स्थिति को मत रहने दीजिए। कल्प-साधना वालों का यह नियम है। आप भी इन नियमों का पालन कीजिए और अनुभव कीजिए कि हम एकान्तवास में हैं।
एक दिन मैंने आपसे पिछले समय में कहा भी है कि एक महीने आप यहाँ सिर्फ दो बातों का अनुभव किया कीजिए कि हम यहाँ न सिर्फ एकान्त में रहते हैं, बल्कि माताजी के पेट में निवास करते हैं। आप शान्तिकुञ्ज को यह मानकर चलिए कि यह माताजी का पेट है और पेट में जैसे बच्चा रहता है, भ्रूण रहता है, उसी तरह, भ्रूण की तरह, बच्चे की तरह आप निवास करिए। यह माताजी का आध्यात्मिक पेट है, जिसमें आप बच्चे की तरह निवास कर सकते हैं और यहाँ से जाने के बाद में आप अपने आपके एक नये जन्म का अनुभव कर सकते हैं। माताजी का बेटा—माताजी का बेटा आप नहीं बन सकते? क्या हर्ज है, आपको, बताइए?
मदालसा के बेटे आप नहीं बन सकते? कुन्ती के बेटे बनने में आपको शर्म आती है, बताइए? सीता के बेटे अगर आप बन जाएँ, तो क्या हर्ज है आपको? नहीं, कुछ हर्ज नहीं होगा आपका। आप अगर ऐसी मनःस्थिति बना लें, तो आपको अपनी गौरव-गरिमा का भान होगा और गौरव-गरिमा का आपको कदाचित् भान हो जाए, तो आप यकीन रखिए, आपका कल्प-साधना में आना सार्थक हो जाएगा। फिर आप ऐसी दिशा, ऐसी प्रेरणा और ऐसा चिन्तन लेकर जाएँगे कि मजा आ जाएगा! इसलिए आप यह अनुभव करते रहिए कि एक महीने तक हम माताजी के पेट में बैठे हुए हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

अमृतवाणी-171
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आत्मावलोकन का सरल उपाय-एकान्तवास (भाग--5)
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एक और अनुभव कर लीजिए कि आप गुरुजी के अवे में बैठे हुए हैं। अवा क्या? कुम्हार अपने बर्तन बनाता है और बर्तन बना करके उन बर्तनों को अवे के भीतर कैद कर देता है। बस, सब बर्तन चुपचाप बैठे रहते हैं और पकते रहते हैं। आप भी चुपचाप बैठे रहिए और पकते रहिए। हम आपको प्रेरणा भेजेंगे, हम आपको विचार भेजेंगे, उसको भी तो सुनिए! बस, अपनी-अपनी ही बकते रहते हैं, हमारी नहीं सुनेंगे क्या? हमारी प्रेरणा पर आप ध्यान नहीं देंगे? हम क्या कहना चाहते हैं, उस पर गौर नहीं करेंगे? उसकी कोई उपयोगिता नहीं है? अपने आपको ही हमारे ऊपर हावी रखेंगे? हमारी मनोकामना पूरी कर दीजिए। ऐसे कौन आपकी मनोकामना पूरी कर देगा, बताइए?
रावण की मनोकामना पूरी करने में कौन समर्थ हो गया? सिकन्दर की मनोकामना कही पूरी हुई? नेपोलियन बोनापोर्ट की कहीं पूरी हुई? हिरण्यकश्यपु ने अपनी मनोकामना पूरी कर पाई? न कर पाई। आप तो बेकार आदमी हो, बार-बार बच्चों की तरह मनोकामना, मनोकामना माँगते रहते हैं? यहाँ तो आप बड़ों की तरह रवैया अख्यियार कीजिए। बच्चे ही बने रहेंगे जिन्दगी भर बड़े भी होंगे! अगर यहाँ आप बड़े हो गए हैं, तो मनोकामना वाले जंजाल को छोड़ दीजिए। मनोकामना तो भगवान ने आपकी पूरी कर दी है। हाथ-पाँव दिए हैं, आप पेट भर के रोटी कमा सकते हैं। अक्ल भगवान ने दी है आपको, आप तन ढकने के लिए कपड़े या पारिवारिक जो छोटी-मोटी जिम्मेदारियाँ हैं, भली प्रकार पूरी कर सकते हैं। यह कौन-सी मनोकामना है सिवाय हविश के! बताइए?
हविश के अलावा कोई मनोकामना नहीं है। हविश को आप हल्की नहीं कर सकते। हविश को जिस दिन आप हल्की कर लेंगे, आपकी कोई भी मनोकामना बाकी नहीं रह जाएगी, यह आप देखेंगे कि आप कितने खुश और प्रसन्न रह सकते हैं। इसलिए आप इस डायन को मार भगाइये न? दुनिया भर का माँगते फिरते हैं—नाक रगड़ते-फिरते हैं—वासनाओं के लिए, तृष्णाओं के लिए, अहंकार के लिए। इसके आगे पल्ला पसारना, उसके आगे पल्ला पसारना, इसके आगे नाक रगड़ना, उसके आगे नाक रगड़ना। आप अपने आप में हेर-फेर कीजिए, अपने आप में हेर-फेर करेंगे, तो आपको इस कायाकल्प-शिविर में आने का मानसिक लाभ मिल जाएगा।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

अमृतवाणी-172
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आत्मावलोकन का सरल उपाय-एकान्तवास(भाग-6)
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आप यहाँ रहिए, हम आपको पका देते हैं। आप आये थे, तब कच्चे बर्तन के रूप में थे और आप जब जाना तब हमारे अवे में पके हुए होकर जाना। मुर्गी अपने बच्चे को छाती से लगाये हुए बैठी रहती है, कछुवी अपने अण्डे को बालू में रख देती है; लेकिन देख−भाल करती रहती है। हम आपको कछुए के अण्डे की तरह कोठरी में बिठा तो गये हैं; पर आप यह मत सोचिए कि हम आपकी तरफ गौर नहीं करते और ध्यान नहीं देते। हम बराबर आपकी तरफ ध्यान दे रहे हैं। किस बात पर ध्यान दे रहे हैं? कि आपका मनःसंस्थान ऊँचा हो जाए, आपकी भावनाओं का स्तर ऊँचा हो जाए, आपके जीवन का लक्ष्य ऊँचा हो जाए, जिससे आपके व्यक्तित्व की गरिमा आगे बढ़ती हुई चली जाए।

🔷 हम केवल यही विचार करते हैं और कुछ विचार नहीं करते—आप सुन सकते हो, तो सुन लेना; नहीं सुन सकते, तो आप फिर हैं ही चिकने घड़ों की तरह; वैसे ही बने रहना, जैसे आए थे, वैसे ही चले जाना। मुर्गी अपने अण्डे को पकाने के लिए छाती से लगाये बैठी रहती है और आपको भी हम मुर्गी की तरह छाती से लगाये हुए हैं कि जब आप पकें, जब आप फूटें और जब आप फुदकना शुरू करें, चूजे की तरह, तो आपका बहुत शानदार जीवन होगा—हमारी भी महत्त्वाकांक्षा यही है। आप भी अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को हमारी तरह गला पाएँ, तो मजा आ जाए! यहाँ क्या-क्या काम कराये जाते हैं? कई चीजें कराई जाती हैं—संयम करा रहे हैं, वास्तविक बात यह है।

🔶 आपको हमने कितनी बार कहा है कि आप आहार के बारे में संयम कीजिए और न सिर्फ आहार के बारे में, बल्कि विचारों के भी बारे में और न सिर्फ विचारों के बारे में, बल्कि उनके व्यवहार के बारे में भी। आपसे चार तपों का जिक्र किया था न, आपको चार तप यहाँ बराबर करते रहने चाहिए। धन के बारे में रोक है—आपको बाजार जाने की, इधर-उधर घूमने की, सैर-सपाटे करने की, मनसादेवी के पहाड़ पर चढ़ने की। पैसा खराब करने पर हमने रोक लगा दी है। जो पैसा आपको, निरन्तर जीवन के लिए नितान्त आवश्यक नहीं है, उसको खर्च मत कीजिए। कंजूसी करें, जमा करें। ना बाबा! कंजूसी के लिए कौन कहता है आपसे? अच्छे काम के लिए कोई खर्च नहीं है क्या? आप फिजूलखर्च जरा भी मत कीजिए और जो कुछ भी आपके पास धन है, उसको लगा दीजिए अच्छे कामों में।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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