अमृतवाणी-168
पिछला शिविर, जो आपसे पहले का गया है, उसमें ढेरों आदमी ऐसे थे, जो अपना वजन छह-छह पौण्ड बढ़ाकर ले गए; क्योंकि जो उन्होंने हल्का-सात्विक भोजन किया, वह ठीक तरीके से हजम हुआ, कम मात्रा में खाया, पेट पर दबाव कम पड़ा, हर तरह से हजम होता चला गया और रक्त बढ़ता गया तथा उनकी सेहत में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ। आप भी ऐसे ही कर लेंगे, जो जायकेदार चीजें हैं, जो न केवल महँगी होती हैं, बल्कि हानिकारक भी होती हैं, उनसे आप अपना पिण्ड छुड़ा लें, तो समझना चाहिए आपने एक ऐसे भूत-प्रेत से पिण्ड छुड़ा लिया, जो देखने में तो बड़ा आकर्षक मालूम पड़ता था; पर आपको पटक-पटक के मारता था। इस दृष्टि से उपवास का भी महत्त्व तो है; लेकिन उपवास के महत्त्व से भी बढ़कर है अनुशासन का महत्त्व। अब आपको एक नई दिशा पकड़नी है, अब आपको एक नया जन्म लेना है। आप एक नया जन्म लेने की कोशिश कीजिए और यह कोशिश कीजिए कि पिछला समय हमारा जीवन सामान्य स्तर का था।
🔷 घिनौना तो मैं क्यों कहूँ? पर आप यह मान सकते हैं कि घटिया स्तर का जीवन था। घटिया ही कहना पड़ेगा, घटिया क्यों न कहें? घटिया मुझे इसलिए कहना चाहिए कि आपके अन्दर भगवान् ने जो क्षमताएँ दी हैं, अगर आपने सही तरीके से उनका विकास किया होता, तो यकीन रखें, आप दूसरे कबीर हो गए होते; आप यकीन रखें, आप दूसरे रविदास और गुरुनानक हो गए होते; आप यकीन रखें, आप दूसरे विवेकानन्द रहे होते और दयानन्द रहे होते; गाँधी हो गए होते; अब्राहम लिंकन हो गए होते। यह भी तो सब घटिया और छोटे स्तर के लोग थे; लेकिन जब उन्होंने अपने आप को समझ लिया और अपने आपकी सही दिशाधारा को ठीक पकड़ लिया और उसी रास्ते पर क्रमबद्ध रूप से चलते चले, तो कहाँ-से पहुँच गये?
🔶 आपके लिए भी यह पूरे तरीके से मुमकिन था; पर आप कर नहीं पाये, क्यों? दिक्कत क्या थी? पैसा नहीं था? साधन नहीं थे? बेकार बात मत करिए! न पैसे से कोई ताल्लुक है, न साधनों से कोई ताल्लुक है, न कठिनाइयों से कोई ताल्लुक है; केवल एक ही बात से ताल्लुक है कि आपका मनःसंस्थान बहुत गया-बीता बना रहा और उसमें से यह विचार न आया कि हमको महान जीवन के अनुरूप अपनी विचारधारा बना लेनी चाहिए। बस, यही एक कारण था। अब आप उस कमी को यहाँ पूरी कर ले जाइए। यह बीच का समय मिला है आपको। बीच का समय नया जन्म लेने का समय है।
.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)
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