गुरुगीता-72

भगवान् को ध्यानमग्न देखकर नारद जी ने लक्ष्मी जी से जब कारण पूँछा, तो उन्हें बताया गया कि वे अपने सबसे बड़े भक्त पृथ्वीवासी एक व्यक्ति की उपासना कर रहे हैं। अपने से भी बड़े भक्त को देखने को व्यग्र नारद वापस लौट पड़े। कितने ही दिन वे खोए खोए घूमते रहे।
एक दिन वह गाँव के बाहरी रास्ते से निकल रहे थे। चमड़े की दुर्गंध उनके चरणों की गति को और तीव्र कर रही थी। उन्होंने जैसे ही दृष्टि उठाई, पशु- चर्मों से घिरा एक मैला- कुचैला चमार दिखाई दिया। वह पसीने में लथपथ चमड़े की सफाई में व्यग्र था। नारद जी समझ गए, हो न हो यही विष्णु का परम भक्त है, जिसका चित्र उस दिन बड़ी निमग्नता के साथ बनाया जा रहा था। अनिच्छित उनके चरण वहीं रुक गए। तीव्र दुर्गंध के कारण वे चमार के पास तो न जा सके। उनके मन में जिज्ञासा जागृत हुई कि इसकी दिनचर्या का निरीक्षण तो करना ही चाहिए। वे दूर खड़े नाक पर हाथ लगाए उसके कार्यों को ध्यानपूर्वक देखने लगे।
चमड़े के ढेर को साफ करते- करते शाम हो गई। नारद ने सोचा, शायद अब किसी मंदिर में जाएगा या अपने निवास पर ही भगवान् का नाम स्मरण करेगा, पर उसके द्वारा ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब तो उनके क्रोध की सीमा न रही। वह सोचने लगे कि एक अधम चमार को मुझसे श्रेष्ठ बताकर मेरा अपमान किया है। कहीं भक्त ऐसे होते है ? अंत: से आवाज आई ,थोड़ी देर और इसकी गतिविधि देखनी चाहिए। अत: वे रुक गए।
चमार तो अपने कार्य में लगा ही था। जब रात होने लगी, तो उसने चमड़े के सारे ढेर को समेटा। जितना चमड़ा दिन भर में साफ कर लिया था, उसे एक गठरी में बाँधा और जो चमड़ा साफ न हो पाया था, उसे एक ओर समेट कर रखा। फिर एक मैला कपड़ा लेकर सिर से पैर तक अपने पसीने को पोंछकर घुटनों के बल बैठ गया और हाथ जोड़कर भाव- विभोर हो कहने लगा-  '' प्रभो! मुझे क्षमा करना, मैं बिना पढ़ा चमार आपकी पूजा करने के ढंग को भी नहीं जानता। मेरी आपसे यही विनय है कि मुझे कल भी ऐसी सुमति देना कि आज की तरह ही आपके द्वारा दी गई चाकरी को ईमानदारी के साथ पूर्ण कर सकूँ। ''
नारद जी ने तभी पाया कि भगवान् विष्णु उसके समीप खड़े मुस्करा रहे हैं। मंदस्मित के साथ वे बोल उठे-'' मुनिराज। समझ में आया, इस भक्त की उपासना की श्रेष्ठता का रहस्य ?''
गुरुगीता पाठ
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सदानन्द: सदा शान्तो रमते यत्र कुत्रचित ।
यत्रैव तिष्ठते सोsपि सsदेश: पुण्यभाजन:।।78।।
अर्थ
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सदानन्दमय, सर्वदा शान्त वे मुक्त पुरुष जिस किसी स्थान में होते हैं आनन्दित रहते हैं, और वे जिस किसी भी स्थान में वास करते हैं वह देश भी पुण्य का आधार अर्थात् पुण्यक्षेत्र हो जाता है ।।78।।
78.
The country and the place where such liberated personalities-always peaceful and in total bliss-reside such places are transformed into holy places.
                                       👣🙏

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