गुरुगीता-70
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे-'' एक हाथी है, उसे नहला- धुलाकर छोड़ दो, तब फिर वह क्या करेगा ? मिट्टी में खेलेगा और शरीर को फिर गंदा कर लेगा। कोई उस पर बैठे, तो उसका शरीर भी गंदा अवश्य होगा। लेकिन यदि हाथी को स्नान कराने के बाद बाड़े में बाँध दिया जाये, तब फिर हाथी अपना शरीर गंदा नहीं कर सकेगा। मनुष्य का मन भी एक हाथी के समान है। एक बार ध्यान, साधना और भगवान् के भजन से वह शुद्ध हो गया, तो उसे स्वतंत्र नहीं कर देना चाहिए। इस संसार में पवित्रता भी है, गंदगी भी है। मन का स्वभाव है, वह गंदगी में जाएगा और मनुष्य देह को दूषित करने से नहीं चूकेगा। इसलिए उसे गंदगी से बचाए रखने के लिए एक बाड़े की जरूरत होती है, जिसमें वह घिरा रहे। गंदगी की संभावनाओं वाले स्थानों में न जा सके। ''
'' ईश्वर भजन, उसका निरंतर ध्यान एक बाड़ा है, जिसमें मन को बंद रखा जाना चाहिए, तभी सांसारिक संसर्ग से उत्पन्न दोष और मलिनता से बचाव संभव है। भगवान् को बार- बार याद करते रहोगे, तो मन अस्थायी सुखों के आकर्षण और पाप से बचा रहेगा और अपने जीवन के स्थायी लक्ष्य की याद बनी रहेगी।उस समय दूषित वासनाओं में पड़ने से स्वतः भय उत्पन्न होगा और मनुष्य उस पाप कर्म से बच जाएगा, जिसके कारण वह बार- बार अपवित्रता और मलिनता उत्पन्न कर लिया करता है। ''
गुरुगीता पाठ
=========
यस्यावलोकनादेव सर्वसंगविवर्जित: ।
एकान्तनिस्पृह: शान्त स्तत क्षणात् भवति प्रिये ।।76।।
अर्थ
===
हे प्रिय जिनके दर्शन मात्र से ही साधक तत्क्षण सर्वसंग शून्य, अत्यंत स्पृहाहीन और शान्त हो जाता है ।।76।।
जब साधक गुरु कृपा से अपनी आत्मा में परमात्मा
के दर्शन एकीभूत हो जाते हैं तब दूसरा कुछ नहीं रह जाता है,और वे सर्वसंगशून्य स्पृहाहीन और शान्त हो जाते हैं। दूसरा कुछ नहीं है। तो किसके साथ संग करेंगे और किससे स्पृहा करेंगे ? वे आधिदैविक सूर्य-चन्द्र आदि में आधिभौतिक मानव पशु, पक्षी, वृक्षलता आदि में एवं आध्यात्मिक अपने चक्षु, कर्ण आदि इन्द्रियों का कारण एकमात्र ब्रह्म स्पन्दन है, यह प्रत्यक्ष करके निमग्न होकर मुक्त हो जाते हैं। जब तक देह रहती है तब तक नाद और
ज्योति में उनका मन क्रीड़ा करता है।यद्यपि वे देहधारी दिखते हैं तथापि सर्वदा नाद के साथ अवस्थान करने के
कारण वे आकाश होकर, अर्थात् निर्लिप्त भाव से अवस्थान करते हैं ।।76।।
76.
Oh, beloved one by the mere vision of param- Brahma the devotee instantaneously becomes self in totality.
COMMENTS:
===========
When the disciple by the grace of the Master visualises the Parmatma in the soul effulgent and these become unified then nothing else different to him exists, he becomes alone in totality, extremely detached and peaceful. When no body else
different to him exists then whose company he will keep and with whom he would be attached ? On visualising the vibration of Brahma as the sole cause of Sun and Moon in the divine sphere, and of the human beings, birds and trees in the physical world and in the spiritual spheres cause of his own eyes, ears and other sense organs he merges into the Brahm and attains emancipation. As long as the body exists, this manas blissfully exists. Such people appear as bearing physical bodies but being constantly poised in BRAHMA they assume the form of Akasha (Void) and exist in total detachment.
👣🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें