बाहर-भीतर-362
बाहर भीतर तन में मन में
पल पल एहसास कराते हो
फ़िर भी भटक भटक मैं जाती
तुम कितना प्यार जताते हो
संसारी बंधन में बंधकर
ख़ूब छलावा देखा है
फ़िर भी तो यह मोह न छूटे
दुनिया से ख़ुद को जो जोड़ा है
तुम ही प्यारे तुम ही न्यारे
सब कुछ हो तुम मेरे प्यारे
राधा रुकमिन मीरा जैसी
भक्ति दे दो दाता प्यारे
मन को अपने वशीभूत कर
चँचलता को आज मिटा दो
दोष दुर्गुणों की ख़ान हूँ फ़िर भी
प्यार से मुझको गले लगा लो
रुँधा गला है याद में तेरी
"अपना"कहकर आज रुला दो
प्यार के शॉवर से नहलाकर
मन को हल्का कर ही डालो !!
फ़िर से--फ़िर से गले लगा लो!!!
@शशिसंजय
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