सलाखों के अन्दर गायत्री साधना-40
अगली बार नौ नंबर बाड़े में यज्ञ के लिए जब पहुँचे, तो
देखा कि बन्दरों ने आतंक मचा रखा है। पीपल के पेड़ पर
चढ़कर इतना आतंक मचा डाला कि चबूतरे की सफाई करने में सभी जुटे हुए थे, चबूतरे के ऊपर टीन शेड पड़ा था इससे बन्दर कभी पेड़ पर तो कभी टीन पर कूद कर तथा डालियों को तोड़-तोड़ कर फेंकें जा रहे थे। जैसे-तैसे सफाई करके यज्ञ सम्पन्न किया तब तक एक बन्दर प्रसाद की थैली उठाकर ले गया और चिढ़ा-चिढ़ा कर खाने लगा । शायद हमें देखकर उन्हें भी गुस्सा आ रहा होगा कि ये इलाका तो हमारा है फिर ये लोग यहाँ कैसे ? हॉलाकि उस थैली में बचा हुआ प्रसाद ही था जो थाल में डालने के बाद बच गया था। मोर बहुत थे वहॉ पर। बहुत ही शान्त और आस-पास घूमने वाले। एक मोर तो इतना घुल-मिल गया था कि यज्ञ समाप्त होते ही वह प्रसाद खाने आ जाता और किसी न किसी बन्दी भाई के हाथ से उठा-उठा कर खाता रहता, हम सभी को भी देखकर आनन्द आता कि किस तरह बन्दी भाइयों की हथेली से बार-बार उठाकर खाता रहता था। जब तक यज्ञ चलता वह उसी परिसर में चारों ओर चक्कर लगाता रहता। गिलहरी और बिल्लियों का भी बोलबाला था वहां। कबूतरों का अपना अलग साम्राज्य था। कुल मिलाकर बहुत बड़ा परिवार मिल गया था हमें। धीरे-धीरे हम भी ड्रामा हॉल को भूलने लगे थे और शिव परिवार के साथ तथा इस नये परिवार के साथ आनन्द लेना सीख रहे थे, ऐसा लग रहा था कि गुरुदेव ने शायद यही सिखाने भेजा है कि केवल बन्दी भाई ही नहीं वहॉ पर रहने वाले सभी जीव गुरुदेव की सन्तानें हैं।
हर बार कुछ न कुछ नया काण्ड देखने को मिलता। कभी बन्दर, कभी बिल्ली और कबूतरों की मारा-मारी कभी गिलहरियों द्वारा दीपक बुझाकर घी फैला देना ,ये सब ऐसी घटनाएं थीं जिसके लिए हमें मानसिक तौर पर तैयार रहना होता था और कार्यक्रम भी कराना होता था। बन्दी भाइयों की खुशी का ठिकाना नहीं था क्योंकि यहाँ पर वे खुलकर अपनी बात कह पाते थे जबकि ड्रामा हॉल में प्रशासन का आना-जाना लगातार बना रहता था। कुल मिलाकर सब कुछ अच्छा चल रहा था। गुरुदेव अपनी तरह-तरह की संतानों से मुलाक़ात करा रहे थे और हम भी सबके साथ घुल मिल कर रहने का अभ्यास कर रहे थे।
क्रमशः!!
'गुरुकॄपा केवलम्'
"गुरुवर शरणम् गच्छामि"
👣🙏
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