गुरुगीता-71

करतारपुर में गुरु नानक साहेब के दर्शन करने एक दिन बहुत संगत आ गयी। लंगर में प्रसाद कम पड़ने लगा । सेवक ने आ कर महाराज जी को बताया तो  सतगुरु जी ने हुक्म किया कि कोई सिख सामने कीकर के वृक्ष पर चढ़ कर उसे जोर से हिलाओ उससे मिठाइयां बरसेंगी वो मिठाइयां संगत में बाँट दो ।
गुरुपुत्र बाबा श्री चन्द और लक्षमीदास बोले महाराज कीकर का तो अपना भी कोई फल नही होता बस कांटे ही काँटे होते है उससे कहाँ मिठाइयां बरसेंगी। कुछ कच्ची श्रद्धा वाले बोले...सारा संसार घूम घूम कर बज़ुर्गी में गुरु नानक साहेब जी सठिया गए है भला कीकर से कब मिठाइयां बरसी है।
सब बातें सुन रहे भाई लहणे को हुक्म हुआ लहणे तू चढ़।
बिना इक पल की देर लगाए भाई लहणा कीकर पर चढ़ गए और लगे जोर जोर से हिलाने। दुनिया ने देखा कि कीकर से मिठाइयां बरसी। सारी संगत जब तृप्त हो गयी तो हुक्म हुआ लहणे नीचे आ जा तो भाई लहणा नीचे आ गए।
गुरु नानक साहेब ने पूछा जब किसी को इस बात पर भरोसा नहीं था तो तूने कैसे किया।
भाई लहणे ने कहा सतगुरु,आप ने ही सिखाया है *कब, क्या, कैसे, क्यों, किन्तु, परन्तु, लेकिन* ये शब्द सेवक के लिए नहीं बने हैं । मेरा आप पर जो विश्वास है उसने मुझे कहा कि मेरे गुरु जी ने कहा है तो मिठाइयां बरसेंगी। मेरा गुरु समर्थ है,,,,मेरा गुरु सच्चा है,,,मेरी अक्ल् छोटी है,,,,
गुरु नानक साहेब ने ये सुनते ही भाई लहणे को छाती से लगा लिया,,,यही भाई लहणा गुरु अंगद साहेब बन कर गुरु नानक साहेब की गद्दी पर विराजमान हुए।
*गुरू की आग्या को शिरोधार्य कर  उसका पालन करना ही गुरू पूजा है।*
गुरुगीता पाठ
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लब्धं वाथ न लब्धं वा स्वल्पं वा बहुलं तथा ।
निष्कामैरेव भोक्तव्यं सदा सन्तुष्टमानसै ।।77।।
अर्थ
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वे ब्रह्मज्ञ व्यक्ति ! प्राप्त अथवा अप्राप्त किंवा अल्प या बहुल योग्य वस्तु पाकर भी सन्तुष्ट मन से और निष्काम भाव से ही भोग करते हैं ।।77।।
77.
These enlightened personalities live thir lives
with total satisfaction and contentment and without any vested interests, irrespective of their worldly achevements.
                                       👣🙏

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