अमृतवाणी-169

यह गुफा प्रवेश है आपका। हमको ऐसा ही करना पड़ा है, जब कभी भी हमारा मन अस्त-व्यस्त हुआ है, तो गुरुदेव ने बुलाया और एक ऐसे स्थान पर रखा, जहाँ हमारे अलावा कोई नहीं था। इससे हमको अपने बारे में विचार करने का मौका मिलता है। आदमी आमतौर से तो दूसरों पर ही विचार करता रहता है। दुकान में क्या हुआ? बेटे का क्या हुआ? बेटी का क्या हुआ? भतीजी का क्या हुआ? दुनिया के जंजाल को तो आदमी बुनता रहता है; पर अपने बारे में कभी विचार नहीं करता। हमको उस एकान्त स्थान में रह कर करके कई बार हिमालय जाना पड़ा, तब हमें कई बार अपने आप में विचार करने का मौका मिला। गुरुदेव का आदेश था कि बाहर की बात पर मत विचार करना, सिर्फ अपनी बात विचार करना और कोई बात मत विचार करना। हमने भी वैसा ही किया। आपको भी ऐसा ही करना पड़ेगा। जब आप यहाँ आए हैं, सिर्फ अपने बारे में विचार करना चाहिए और सब बातों को भूल जाना चाहिए। खासतौर से आप घर की बातों को भूल ही जाएँ।

🔶 घर की बातों को आप जरा भी स्मरण न करें। घर में क्या हो रहा होगा? फायदा हो रहा होगा कि नुकसान हो रहा होगा, बेटी का ब्याह हो रहा होगा, बेटे का ब्याह हो रहा होगा, अमुक बात हो रही होगी, अमुक बीमार पड़ा होगा, इन बातों से आप क्या कर सकते हैं? या तो आप वहाँ जाइये, विवाह-शादी कीजिए; नहीं जा सकते, तो चिन्ता को छोड़िए। आप एकान्त में भी रह रहे हों और एकान्त के फायदे को भी खत्म कर रहे हों—यह सब मत कीजिए।

🔷 आप सबसे पहले अपने मन को अलग कर लीजिए और यह मानकर चलिए कि हम एक महीने के लिए कहीं अलग, विदेश चले गए हैं, बीमार हो गए हैं या कुछ और हो गए हैं। एक महीने अगर आप चिन्ता नहीं करेंगे, तो आपका मन उस दिशा में चलेगा, जहाँ आपको विचार करना चाहिए और आप अगर अपने मन को खाली नहीं करेंगे, जंजाल में ही बनाए रखेंगे, तो आप इस एकान्त साधना में, जिस उद्देश्य के लिए बुलाए गए हैं, आपके लिए पूरा कर सकना सम्भव नहीं होगा। फिर क्या करें? जैसा आपने सुना होगा कि इलाहाबाद में कल्प-साधना के शिविर चलते हैं और वह त्रिवेणी के तट पर माघ के महीने में महीने भर के होते हैं।

.... क्रमशः जारी
✍🏻 पं श्रीराम शर्मा आचार्य (अमृत वाणी)

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