अतिथि(सामाजिक)-46
कल अचानक
काफ़ी लम्बे अरसे के बाद
फोन की घन्टी बज उठी
एक ऐसे अतिथि के आने की
सूचना थी....जो शायद बरसों पहले
विदेश में जाकर बस चुके थे
कुछ घन्टों के लिये मेहमाननवाज़ी हुई
और वापिस अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान
वर्षों पूर्व एक खिलखिलाता हँसमुख
व्यवहार लिये चेहरा.......
आज कुछ गंभीर...न जाने किधर सोच में
डूबा हुआ दिख रहा था
पीढ़िया-पीढ़ियों से दूर होती जा रहीं हैं
भावी पीढ़ी का रुझान भारत में न होकर
विदेशों की ओर है क्यों कि....
वे जन्मे वहीं पर हैं,पढ़ते भी वहीं पर हैं
किसी भी कारणवश इधर आये भी नहीं
एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं
आख़िर क्यों......
दोष उस नाज़ुक पीढ़ी का नहीं
न जाने किन हालात-किस चाहत के चलते
बाहर जाकर बस गये मॉ-बाप
ऐसा कब होगा...,,
जब योग्यता की परख
हमारे देश में ही होने लगेगी
समस्त सुविधायें जो बाहर जाने पर
मिलती हैं अपने देश में ही मिलने लगेंगीं
ताकि कोई भी भारत माता का लाल
पैसे के लिये अपना वतन छोड़कर
ना जाना चाहे...,
💔💔🖤💔💔
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें