बेमन(व्यक्तिगत)-59

मैं हर वर्ष बेमन से

दिवाली मनाता हूँ

परम्परा से जुड़कर

संस्कारों से लिपट कर

लेकिन यह मेरी दीवाली नहीं है

मैं तब हर रोज़ दिवाली मनाऊँगा

जब हम सबमें 

मानवता का बोध हो जायेगा

वह मेरी दिवाली होगी

मेरी अपनी दिवाली

ऐसी दिवाली

जैसी किसी ने मनाई नहीं

जैसी कोई मना नहीं सकता

जैसी कोई मना नहीं पायेगा

मेरी दिवाली

मेरे अपने ढँग की दिवाली

लेकिन.....

कब......

आख़िर कब.....

       💔💔🖤💔💔

        20/9/75


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