धर्म(सामाजिक)-53

धर्म की छॉव में बैठकर

मतलब की धूप सेंकना

इन्सान की आदत ही बन गई है

न जीवन में फ़र्क़ 

न आचरण में बदलाव

भीतर में झूठ और फ़रेब 

बाहर से मृदुल वाणी

आचरण में दिखावा

क्या यही है धर्म...,?

क्या यही है धारणा...,?

क्या यही है समाधि..,,?

ये सब बहुत गूढ़ हैं

लेकिन...

लोग ये ढोंग और पाखण्ड का चोगा 

तन और मन में क्यों पहनते हैं

पता नहीं......,?

               💔💔🖤💔💔

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