किलकारी(व्यक्तिगत)-54

किलकारी जब गूँजती है

घरों के ऑगन में 

याद आ जाता है वो बचपन

खेला करते थे बगिया में 

आज नहीं वो बाग़ बग़ीचे 

और नहीं वो नीम का पेड़

जिससे घन्टों बतियाते थे

कहते थे सब मन का भेद

अँगना भी अब कहॉ बचा है

बच्चे घर में हो गये क़ैद 

अब तो टी वी मोबाइल से

खेला करते घर में ही बैठ

देख के इन भोले बच्चों को

लगता बचपन बरबाद हुआ

काश.....,

फिर से वो झूले वो बगिया

वो खुला हुआ अँगना

और वही बतियाने वाला

नीम का पेड़

इन बच्चों को भी मिल पाता

                 💔💔🖤💔💔

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