रेत(आध्यात्मिक)-62
रेत फिसलती है जैसे
ये वक़्त फिसलता जाता है
मन नहीं समझता इस सबको
वो मस्त हुये ही जाता है
तन भी धीरे-धीरे ढलता
मन फिर भी समझ न पाता है
सब मन के मारे दुनियाँ में
ये मन तो कुँलाचें भरता है
दाता मेरे मन को तुम पकड़ो
मेरे वश की तो बात नहीं
मन रहे तुम्हारी मुट्ठी में
दे दो इत्ती सौग़ात यही
👣🙏🏻
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