बाग़-बग़ीचे(आध्यात्मिक)-45
बाग़ बग़ीचे हरियाली में
क्या ही मन रम जाता है
कल-कल करते झरने बहते
मन बच्चा बन जाता है
ऊँची-ऊँची चोटी पर जाना
मस्त पहाड़ों पर चढ़ जाना
कहॉ-कहॉ तुम बैठे जाकर
देखके सब ये दंग रह जाना
जगह-जगह के दृश्य दिखाकर
मन को कितना भरमाते हो
कुछ पल को तो भूल ही जाती
तुम तो दिल में बिराजे हो
मेरे दाता कृपा तुम्हारी
पल-पल बरसा करती है
मैं तो ऑंख मूँदकर बैठी
चँचलता ही भटका करती है
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें