सजल श्रद्धा-प्रखर प्रज्ञा(आध्यात्मिक)-48
ये छतरियॉ
छतरियॉ नहीं
जीवन्त तुम्हारे प्राण हैं
सिर झुकाते ही वहॉ पर
मुझको.....
थाम लेते तुम्हारे हाथ हैं
प्यार की छुअन होते ही
बह निकलते अश्क़ हैं
लाड़ कितना है तुम्हारा
ये पूछ लो उससे....
जो बहती अश्रुधार है
प्यार की चादर से जैसे
ढक दिया तुमने मुझे
कैसे कहूँ अनाथ हूँ मैं
मॉ-बाप मेरे आप हैं
आप ही सब कुछ हैं मेरे
क्या कहूँ मैं आपसे
आप से तुम
तुम से तू के
सारे रिश्ते आप हैं
यार भी तुम
प्यार भी तुम
और भी संबंध जो...
दुनिया मे होते हों सभी.....
वो भी संबंध मेरे
आप हैं बस आप हैं
"मेरे दाता"
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