सम्बोधन(व्यक्तिगत)-56
तुम बड़े प्यार से
बड़े अपनेपन से
पुकारते हो मुझे.....
कभी पण्डित-कभी लड़का जीजी
शायद इसीलिये कि
प्रतिरोध तुम कर नहीं सकते
व्यवस्था के प्रति
परिवार और समाज ने लड़की होने की
बँदिशों में बॉध रखा है तुम्हें
जब तुम्हारे लिये लड़ता है
ये शरीर,ये वाणी,ये मन
तो तुम ख़ुश होकर पुकारते हो
इन नामों से......
तुम्हारे द्वारा दिया गया ये सम्बोधन
कुछ अलग सा हौसला भर देता है
मुझमें ......?
काश.....ये हौसला,
कुरीतियों से बग़ावत का,
और निडर सी साफ़गोई.....!
तुम सभी में भर जाये
तुम सभी की आत्मा भी (जो न लड़का है न लड़की)
पुकार उठे ?
कि हम लड़कियॉ भी....?
बग़ावत का बिगुल बजा सकती हैं
तुम्हारी....
रूढ़िवादी व्यवस्थाओं के प्रति....?
ख़ामोश .....!
💔💔🖤💔💔
2/11/76
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