दूर(आध्यात्मिक)-55

दूर क्षितिज से आते दिखते

ब्रह्मरन्ध्र में जाते दिखते

अन्तर में जाते ही मुझको

कितने ही तुम नाच-नचाते

कभी रुलाते कभी हँसाते

जाने क्या-क्या दृश्य दिखाते

घन्टों साथ बिताकर संग में 

फिर से क्यूँ ग़ायब हो जातेa

मुझको कितना अच्छा लगता

संग में जब तुम मेरे होते

छोड़ के जब तुम मुझको जाते

दिल के कितने टुकड़े हो जाते

            👣🙏🏻

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