वँश(आध्यात्मिक)-58
वँश परम्परा चलती रहे
मेरे गुरुवर मेरे दाता की
तेरे दर पै आना बना रहे
सिर झुकते रहें मेरे साक़ी
तुम खुदा के भेजे बन्दे हो
तुम किसी खुदा से कम भी नहीं
जो मॉगा है तेरे दर पर
कोई ख़ाली हाथ गया ही नहीं
तुम देते हो दिखता भी नहीं
हम देते और दिखलाते हैं
ये फ़र्क़ है तुझमें और मुझमें
तुझ सी मेरी औक़ात नहीं
👣🙏🏻
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