कभी कभी(व्यक्तिगत)-83

कभी कभी मन होता है

चमकते चॉद की

सुनहरी चॉदनी निकालकर

और नदी के दो 

किनारों को बाँधकर 

तुम्हारे पास भेज दूँ

और तुम....

चॉद न होते हुये भी

चॉदनी में नहाओ

कभी कभी मन होता है कि

इन ख़ूबसूरत फूलों की 

ख़ुशनुमा ख़ुशबू चुरा लूँ

और इसे....

हवा में उछालकर

तुम्हारे पास भेज दूँ

जिससे तुम

इन अनगिनत फूलों की

महकती ख़ुशबुओं से भर उठो

कभी कभी मन होता है

किसी तपती दोपहरी से जाकर कहूँ

अकेली क्यों जलती हो ?

लाओ थोड़ी सी आग मुझे दे दो

और फिर उस तपन को

दीपक में रखकर 

तुम्हारे पास भेज दूँ

जिससे तुम

मेरे हृदय की

उस तपन से जल उठो

लेकिन है नहीं संभव

चॉदनी समेटना

या

फूलों की ख़ुशबू चुराना

या

तपन का मॉगना

       मेरे दाता

        👣🙏🏻

        19/9/76

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