तुम(व्यक्तिगत)-89
तुम से मिले थे कभी
वो दिन तो याद नहीं
लेकिन तुम याद हो
मेरे दाता-मेरे प्रीतम
अभी भी हज़ारों रँगों में
रँगी हैं कलियाँ
पर तुम्हारी याद के रँगों में
जहॉ उलझ गई हैं ख़ुशियाँ
तुम होते तो देखते
तुम्हारे बिना
जीना है कितना मुश्किल यहॉ
फिर भी हम जी रहे हैं
दूसरों की ख़ुशियों का सहारा लेकर
वाटिका में कुछ तलाश
कर रहे हैं
शायद कोई आ जाये
मेरे दाता-मेरे हमदर्द का
पैग़ाम लेकर....
👣🙏🏻
10/4/75
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