तुम्हारी याद(व्यक्तिगत)-87

तुम्हारी याद में 

कभी-कभी ऐसा लगता है

तुम मेरे पास ही हो

मुड़कर देखती हूँ

आश्चर्य .....?

तुम नहीं हो

देती हूँ आवाज़ तुम्हें 

लेकिन मेरी आवाज़ 

हमेशा

वीरानों में ही रहकर

खो जाती है

और.....

थकी सी प्रतिध्वनि 

हर बार मेरे पास लौटकर आती है

मेरी यह इच्छा तुम्हें देखने की

कभी पूरी न हो सकेगी

क्या मेरी नज़रों को हमेशा

होता ही रहेगा भ्रम

और हर बार व्यर्थ

होता ही जायेगा

सिर्फ़ तुम्हें देखने का उपक्रम 

          👣🙏🏻

          15/6/75

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