दिल्लगी(आध्यात्मिक)-112

ये कैसी दिल्लगी है 

ये कैसा मेरा पागलपन है

तुझसे मैं बातें करती हूँ 

जैसे सुनता तू सब कुछ है

तू तो वैसे भी सुनता है 

हर पल बक-बक करती हूँ

तेरे प्यार को तेरी डॉट को 

हर छिन अनुभव करती हूँ

मुझको ये धोखा हो जाता 

पास में मेरे तुम बैठे हो

झट से मैं भी पूँछ उठती हूँ 

दाता तुम अब कैसे हो

तुम तो अच्छे ही होगे बस 

हाल हमारा बुरा हुआ

तेरे जाने के बाद से मेरा 

हर पल ही बदहाल हुआ

कितनी तमन्ना कितनी यादें 

दिल में सँजोकर रखी हैं

भूली-बिसरी यादों की टोकरी

 तुमने अब भी ताज़ा कर रखी है

                        👣🙏🏻


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