पिंजरा(सामाजिक)-108
(राह गर्दिशों में हरदम)
पिंजरे से निकल के पँछी,भागा जहॉ से आया
पिंजरे को छोड़ ख़ाली,दुख से वो गाता आया
तूने ज़िन्दगी गुज़ारी,झगड़े-फ़साद करते
कुछ अच्छे काम ख़ुद से,जीवन में कर न पाया
पिंजरे को-------
अब पीटता है सिर को,ऐसा बिलखता है वो
एक बार मौक़ा फिर से,वो मॉगता ही आया
पिंजरे को----
ग़र दे भी दें वो मौक़ा,दुनिया में जन्मने का
तू फिर से भूल जाये,क्या काम करने आया
पिंजरे को----
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें