ऑखिन देखी(सामाजिक)-120
कर्मों की गति समझ न आती
बार-बार फिर लौट के आती
गुज़री बातें और गुज़री यादें
हरपल आकर क्यों हैं सतातीं
काफ़ी सालों पहले देखा था
अपने मिलने-जुलने वालों को
आज उन्हीं के साथ हो रहे सब
सहते कितने अत्याचारों को
घर के बच्चे क्यूँ दु:ख देते हैं
अपने ही मॉ - बापों को
उनका भविष्य भी निर्भर है
अपनी ही औलादों पर
आज भले ही छोटे बच्चे
कुछ भी समझ ना पाते हो
लेकिन कल को बड़े हुये तो
वही दोहरायेंगे फिर मॉ - बापों से
समझ पड़े तो आज समझ लो
तुमको भी बूढ़ा होना ही होगा
जो कुछ भी तुमने कल बोया था
वो कर्म तुम्हें भी भोगना ही होगा
💔💔🖤💔💔
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