बदली सी सूरत(सामाजिक)-125
ये बदली सी सूरत,क्यूँ बदले ये तेवर
कहीं कुछ है बिगड़ा,कहीं कुछ है सँभला
हमारे जो भीतर में बैठा है बन्दा
नहीं है हमारी तरह से वो गन्दा
दिखावे की चादर से कब तक ढकोगे
यादों के खंडहरों से कब तक जुड़ोगे
नये पथ को कैसे भी चुनना ही होगा
पुराने खंडहरों को तोड़ना तो पड़ेगा
तभी मैल की चादर धुल सकेगी
आत्मा भी तभी ख़ुश होकर रहेगी
👣🙏🏻
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