दर पर(आध्यात्मिक)-124

दर पर तुम्हारे जो आते सवाली

करते हैं सजदा शरण में तुम्हारी

वो रौनक़ें बहारा वो शामें सुहानी

बहुत याद आती है वो जुड़ती रवानी

तलाश-ए-दीद की रहती है ख़ुमारी 

तमन्नायें मिलने की होती हैं हमारी

आ जाओ फिर से रूबरू हो सकें हम

तेरी निगाहें करम को फिर पा सकें हम

दिल की लगी को बुझाओ तुम आके

करोगे भी क्या अब तुम हमसे दूर जाके

                        👣🙏🏻


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