शिकायत(आध्यात्मिक)-104
ऐ दिल तूने तो शिकवा या
शिकायत भी नहीं की
कितना भी कहा या
सुनाया हो तुझे तेरे बन्दों ने
दरअसल धोखे में जीता
रहा तू भी ज़िन्दगी भर
कि सभी तो तेरे अपने हैं
फिर किसको क्या कहूँ
सच तो ये है कि न कोई
अपना न कोई पराया है
सलाम उसी को जिसका
आफ़ताब उग आया है
डूबते सूरज को कब
किसने सलाम ठोंका है
बुझते हुये चिराग़ को
बुझने से किसने रोका है
👣🙏🏻
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