दिल(आध्यात्मिक)-114
दिल में तुम्हारी यादों का
दिया बराबर जलता है
बाती तो तुम बने हो प्यारे
"घी"जैसा दिल जलता है
अर्पण क्या कुछ करूँ मैं तुमको
ख़ुद को ही तुमको दे डाला
सिर से नख तक देखो ग़र
अपने ही रँग में रँग डाला
चैन नहीं आराम नहीं है
कहने को कुछ काम नहीं है
तेरे साँचे में ढल जाना
ये भी कोई आसान नहीं है
जितने नक़ाब चढ़े थे तन पर
एक-एक करके उतारा है
इसी तरह से तुमने मुझको
कुछ अपने ही ढँग से सँवारा है
👣🙏🏻
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