ऑखिन देखी(आध्यात्मिक)-157
अजनबी शहर के अजनबी दोस्त
विदाई के समय न जाने क्यूँ
रो पड़े फफक कर
कहने लगे अब कब आओगे
आपने कम से कम दर्द तो सुना
यहॉ फ़ुरसत नहीं किसी को
मँजिलें बड़ी हैं पर दम घोटूँ वातावरण है
अकेले हैं हम सब कहने लगे व्यथा अपनी
आग्रह जल्दी आने का
वो प्यारा दोस्त दुम हिलाते हुये
दौड़कर पास आ गया
चाटने लगा पैरों को
जैसे कह रहा हो जल्दी आना
गाड़ी में बैठते ही गोदी में सिर रख दिया
सिर पर हाथ फेरती रही
कितना मासूम प्यार है ये
सबके अपने अपने क़िस्से हैं
दर्द भरी कहानियॉ हैं क्या कर सकती हूँ मैं
केवल केवल सुन सकती हूँ
आप सभी तक लेखन के माध्यम से
पहुँचा सकती हूँ प्रार्थना कर सकती हूँ
सबके सुखी होने की बस..और कुछ नहीं
ज़िन्दा रही तो दुबारा मिलूँगी
चल पड़ी ये सोचकर वहॉ से
दूर तक हिलते हुये हाथ दिखाई पड़ रहे थे
कुछ के ऑसूँ गालों पर लुढ़क रहे थे
सोच रही थी शायद....,
सत्संग (सत्य का संग)इसी को कहते हैं
💔💔🖤💔💔
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