मेरे गुरुवर(आध्यात्मिक)-151

बादलों के बीच से झलक तुम्हारी दिखती है

सूरज के बीच से मुस्कुराती हुई सी लगती है

दोनों हाथों को उठाकर आशीर्वाद की मुद्रा में  

सब पर बरसाते देते हो अपनी रहमतों की वारिश

तब पूरी दुनिया ही मुझको ख़ुशनुमा लगने लगती है

और कोई नहीं मेरे प्यारे गुरुवर जन्म जन्मान्तरों से 

मॉ-बाप के रूप में हर बार तुम ही मिलते आये हो

मुझ पर अपने प्यार की बरसात करते आये हो

ना जाने कब से ढोते रहे हो भार तुम दोनों मेरा

तुम्हारे ही उपकारों से भरा रहा है हर जीवन मेरा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

याद आपकी-428

दृष्टा-425

कर्म -426