रूह में पहुँचकर(आध्यात्मिक)-144
रूह में पहुँचकर समा जाते हो इतना
कि बाहर से इसका अहसास भी नहीं
आनन्द की उस सीमा तक पहुँचना
कि और कुछ भी हमें तो याद नहीं
सुकून दे जाता है उस वक़्त का आलम
कि ज़रा सी आहट भी बर्दाश्त नहीं
बस जिस हाल में हैं बने रहें उसी में
दूसरे किसी का गुज़रना भी सहन नहीं
👣🙏🏻
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