ऑखिन देखी (सामाजिक)- 138

कुछ सालों पहले,एक महिला को लेकर

घर वाले,किन्हीं सन्त के पास आये

उन महिला का बदन फोड़ों से भरा था,

मवाद फूट-फूट कर निकल रहा था,

सभी जगह डाक्टरों से इलाज कराया,

गन्डे-ताबीज़ भी बँधवाये,पीर-फ़क़ीरों से,

कुछ फ़ायदा न हुआ,तब किसी ने उन्हें सन्त

की शरण में भेजा था,उन्हें देखते ही सन्त

चिल्लाने लगे,वहॉ से जाने को कहने लगे

वे लोग रोते रहे गिड़गिड़ाते रहे,उन्हें मनाते रहे,

बहुत देर तक बैठे रहे,कि शायद वे कुछ बोलें

उम्मीद की किरण जगी,दयालु सन्त ने बोलना

शुरु किया, तुम ठीक नहीं हो सकती,ये तो भोगना

ही होगा ,तू नहीं तेरे पूरे परिवार को,ये कष्ट 

झेलना ही होगा,डाक्टर थी तू पिछले जन्म में...

ज़बरन लोगों को इन्जेक्शन लगाती थी,वे ही अब

फोड़ा बनकर निकल रहे हैं,पब्लिक के पैसों से

चैरिटेबल हास्पीटल बनाया था,खूब पैसा खाया

लोगों से,पति-पत्नी दोनों ने मिलकर धोखा दिया

पब्लिक को,तेरा पति कम्पाउन्डर था पिछली बार,

अब ऊपर वाला तुम्हें जो दे रहा है प्रसाद मानकर

भोगो,कोई इलाज नहीं इसका,दोनों हाथ ऊपर 

उठाकर प्रार्थना के स्वर में बोल उठे,इसका इलाज

तो उसी के पास है...उसी के पास है.....मैं कुछ भी

सहायता नहीं कर सकता, ये तो तुम्हें भोगकर ही

ख़त्म करना होगा..दोनों हाथ प्रार्थना के रूप में जोड़े

रहे काफ़ी देर तक...ये सत्य घटना सोचने पर 

विवश कर देती है कि आज हम क्या हैं कल क्या

होंगे पता नहीं 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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