रँग- बिरँगे ग़ुब्बारे(आध्यात्मिक)-154
रँग-बिरँगे ग़ुब्बारे जब,
आकाश में छोड़े जाते हैं ।
उन्हें देखने सबके सिर,
ऊपर को मुड़ते जाते हैं ।
--सोचा करती हूँ तब मैं भी,
हम सबका जीवन भी ऐसा है ।
डोर किसी के हाथ है प्यारे,
जीवन भी उड़ता जाता है ।
--तरह-तरह के मन वाले हम,
रँग-बिरँगे ग़ुब्बारे हैं ।
तुझसे ऊपर मैं ही उड़ूँगा,
अद्भुत ऐसी सोच वाले हैं ।
--डोर हवा में जब छोड़ी हमने,
उड़ते हुये हम आ गिरते हैं ।
अरमानों के ढेर से सपने,
सब कुछ नीचे आ पड़ते हैं ।
--कौन बचाये हमको प्यारे,
जब उसने ही छोड़ दिया ।
अच्छा फूल लगा डाली पर,
उसने झट से तोड़ दिया ।
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें