दुनिया(आध्यात्मिक)-132

दुनिया मुझको जाने 

ऐसी नहीं है ख़्वाहिश 

पहचानो तुम ही मुझको 

इतनी सी है कोशिश

कोई कुछ भी कहे मुझको 

कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

तुम कुछ भी ज़रा सा कह दो 

बहुत गहरे असर पड़ता

अच्छों ने मुझको अच्छा 

बुरों ने माना बुरा मुझको

जिसने जैसा चाहा अब तक

वो बना दिया है मुझको

मिट्टी में बैठने की औक़ात है मेरी 

मुझको सिर पै तुमने है बिठा दिया 

कैसे शुकराना करूँ मैं भगवन

तुमने अपनी मौज में रहना सिखा दिया

                         👣🙏🏻


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