मन समर्पित(आध्यात्मिक)-139
मन समर्पित तुम्हें कर दिया
मन की वृत्तियाँ चँचल क्यों हैं
मेरे भगवन "मन" तो तुम्हीं हो
फिर मन ये नासमझ सा क्यूँ है
मन की सारी इच्छाओं को तुम
अपने आप में विलीन कर लो
मन शरण तुम्हारी पड़ा हुआ
ये भाव प्रबल तुम ही कर दो
मन की चँचलता भी हर लो
और मन को मुट्ठी में कर लो
ऐसा अगर करोगे तो मन मेरा
चरणों में तुम्हारे टिक पायेगा
आगे-पीछे किधर से भी
बस मोह नहीं आ पायेगा
तुम जब साथ होते हो मेरे
तब ही पूर्ण वैराग्य होता है
पल भर तुमसे दूर हुई तो
फिर सँसार चला आता है
👣🙏🏻
13/12/10
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