दिल के भीतर(आध्यात्मिक)-155
दिल के भीतर की मूरत को,
हरदम पूजा करती हूँ मैं ।
लोग कहें मैं हुई हूँ बाबरी,
गुरु को छोड़ चुकी हूँ मैं ।
--गुरु कहे मैं अन्दर बैठा,
तुझको ही देखा करता हूँ ।
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे से ज़्यादा,
दिल में ही तेरे रहता हूँ ।
--दर दर भटकाया है तुझको,
अन्तर्मन में लाने को ।
दुनिया कैसे जानेगी ये,
क्या करवाना है मुझको ।
--दिन और रात मुझी में रहना,
और न कुछ भी करना है ।
मेरा काम और मेरी पूजा,
यही तो तेरा गहना है ।
....किसी से अब ना डरना है ।
.....इसी राह पर चलना है ।
👣🙏🏻
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें