दिले शायरी-29
--तेरे अलावा और किसी की बात नहीं आती मुझको
क्या है जादू ऐसा तुझमें पता नहीं लगता मुझको
--तेरे मेरे दरमियाँ कुछ कशिश है अजीब सी
क्या बताऊँ कैसे भी छुड़ाये नहीं छूटती
--छोड़ा है कब किसी ने अपनों को रुलाने में
तुम क्या हरवक्त ग़ैरों की बात करते हो
--स्वार्थी हैं जो बँध गये वर्ना
कौन किसका है इस ज़माने में
पत्थरों पर असर नहीं होता
पीर लाखों हुये ज़माने में
--यूँ ख़ुद से दूर कर लिया ख़ुद को
कह दिया उसने इक खुदा हूँ मैं
यूँ भोग-विलास से कुछ नहीं होगा
क्यों कि अब इँसान हो गया हूँ मैं
💔💔🖤💔💔
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