राग-द्वेष(सामाजिक)-130

राग-द्वेष और अन्दर की ईर्ष्या

जब तक नहीं मिट जाती है

कितने भी जप-यज्ञ करा लो

फ़र्क़ न कुछ पड़ने वाली है

ख़ुशियाँ लेके दर-दर जाना

ये तो ज़रूरी नहीं ही होता

घर आये को प्यार जताना

अपनापन तो यही है होता

दिखलावे भी तरह-तरह के

मन को जो भरमाते रहते हैं

अपने भीतर कुछ होने का 

वह ख़ुद अँहकार जतलाते हैं

अधजल गगरी छलकत जाये

ऐसा ही दिखावा भी होता है

मेरे गुरुवर साधक को भला ये

सब कुछ कैसे सुहा जाता है

                👣🙏🏻

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